₹1200 प्रतिमाह में कैसे चलेगा न्यूज पोर्टल? उत्तराखंड सरकार के विज्ञापन नियमों पर उठे गंभीर सवाल
उत्तराखंड में डिजिटल मीडिया नीति पर बवाल: ₹1200 की विज्ञापन राशि पर बिफरे पत्रकार, टेंडर हटाने की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में स्वतंत्र पत्रकारों और छोटे न्यूज पोर्टलों के अस्तित्व को बचाने के लिए सरकार से वर्तमान टेंडर आधारित विज्ञापन व्यवस्था को तुरंत समाप्त करने की मांग उठी है। डॉ. जसविंदर सिंह गोगी ने राज्य सूचना एवं लोक संपर्क विभाग (DIPR) द्वारा लागू की गई टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए एक पारदर्शी, स्थायी और वस्तुनिष्ठ विज्ञापन नीति लागू करने का पुरजोर आग्रह किया है।
डिजिटल दौर में जहां सूचनाएं पल भर में आम जनता तक पहुंच रही हैं, वहां उत्तराखंड सरकार द्वारा न्यूज पोर्टलों के लिए निर्धारित ₹1,200 प्रतिमाह की विज्ञापन राशि को पूरी तरह अपर्याप्त और अव्यावहारिक बताया गया है।
बढ़ते संसाधनों के खर्च, तकनीकी बुनियादी ढांचे और कर्मचारियों के वेतन के बीच इतनी मामूली राशि से डिजिटल मीडिया का संचालन नामुमकिन साबित हो रहा है। राज्य में सूचना विभाग द्वारा डिजिटल विज्ञापनों के लिए ई-निविदा (EOI) की जटिल शर्तों के चलते छोटे व क्षेत्रीय पोर्टल इस होड़ से बाहर हो रहे हैं।
डॉ. जसविंदर सिंह गोगी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती में डिजिटल मीडिया और स्थानीय न्यूज पोर्टलों की भूमिका बेहद अहम है। सीमित संसाधनों के बावजूद ये पोर्टल दूर-दराज के इलाकों, जनसमस्याओं और जमीनी मुद्दों को सरकार के सामने लाते हैं। लेकिन मौजूदा टेंडर प्रक्रिया और ₹1,200 की नाममात्र राशि से न केवल इन पोर्टलों का आर्थिक गणित बिगड़ रहा है, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता के वजूद पर भी सीधा संकट मंडरा रहा है।
पत्रकारों और न्यूज पोर्टलों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार के सामने प्रमुख मांगें रखी गई हैं। इसमें टेंडर व्यवस्था को समाप्त कर स्थायी नीति लागू करना, ₹1,200 प्रतिमाह की न्यूनतम राशि पर तुरंत पुनर्विचार कर व्यावहारिक दरें तय करना और विज्ञापन आवंटन में सभी पात्र व पंजीकृत न्यूज पोर्टलों को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर देना शामिल है। इसके अलावा, विज्ञापन दरें केवल पोर्टल की पहुंच (Reach), प्रसार, कंटेंट की गुणवत्ता, नियमितता और डिजिटल प्रभाव के पारदर्शी व वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर तय की जानी चाहिए।
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मांग की गई है कि छोटे व स्वतंत्र पोर्टलों के लिए एक सरल, मानकीकृत और पारदर्शी पंजीकरण व्यवस्था बनाई जाए। साथ ही, विज्ञापन आवंटन और बिलों के भुगतान की प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक की जाए, ताकि पूरी प्रणाली में जवाबदेही बनी रहे। इसके अतिरिक्त पत्रकारों के सम्मान, अधिकारों और कार्य की स्वतंत्रता को ध्यान में रखकर नीति की व्यापक समीक्षा करने की बात कही गई है।
डॉ. गोगी ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह किसी भी नई नीति को अंतिम रूप देने से पहले पत्रकार संगठनों और न्यूज पोर्टल प्रतिनिधियों के साथ सीधी वार्ता करे। इस नई नीति में स्पष्ट पात्रता मानदंड, समान अवसर, समयबद्ध भुगतान और किसी भी शिकायत के निवारण के लिए एक प्रभावी अपील व्यवस्था का शामिल होना अनिवार्य है, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों और पत्रकारिता की गरिमा दोनों की रक्षा की जा सके।






