ग्रीष्मकालीन नहीं, अब ‘पूर्णकालिक’ राजधानी चाहिए; उत्तराखंड में आंदोलन का नया शंखनाद
पलायन रोकने के लिए गैरसैंण जरूरी, देहरादून में आंदोलनकारियों का सरकार को अल्टीमेटम
उत्तराखंड में फिर गूंजा ‘राजधानी गैरसैंण’ का नारा, देहरादून में आंदोलनकारियों ने खोला मोर्चा
देहरादून (ब्यूरो)। उत्तराखंड की भावनाओं के केंद्र ‘गैरसैंण’ को स्थायी राजधानी बनाने की सुलगती आग एक बार फिर सड़कों पर आ गई है। सालों की प्रतीक्षा और सरकारों के ढुलमुल रवैये के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता मनमोहन शर्मा ने देहरादून के एकता विहार में मोर्चा खोल दिया है। राज्य आंदोलनकारियों के साथ मिलकर उन्होंने क्रमिक अनशन शुरू कर दिया है, जिसका सीधा मकसद सत्ता के गलियारों तक पहाड़ की आवाज पहुंचाना है।
एकता विहार की गली नंबर 15 में बाकायदा टेंट गाड़कर आंदोलनकारियों ने डेरा डाल दिया है। एकता विहार के अध्यक्ष और प्रमुख आंदोलनकारी मनमोहन शर्मा का कहना है कि सरकारों ने गैरसैंण को महज एक ‘पिकनिक स्पॉट’ या ‘शोपीस’ बनाकर रख दिया है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि अब ग्रीष्मकालीन राजधानी के ‘लॉलीपॉप’ से काम नहीं चलेगा, पहाड़ को अपनी पूर्णकालिक स्थायी राजधानी चाहिए।
आंदोलनकारियों का तर्क है कि जब तक राजधानी पहाड़ में स्थापित नहीं होगी, तब तक पर्वतीय क्षेत्रों का दर्द कम नहीं होगा। विधानसभा सत्रों के दौरान मंत्रियों और अफसरों की भारी-भरकम फौज कुछ दिनों के लिए गैरसैंण (भराड़ीसैंण) जाती तो है, लेकिन सत्र खत्म होते ही फिर देहरादून की आबोहवा में लौट आती है। इस वीआईपी कल्चर और पहाड़ से दूरी ने ही पलायन की समस्या को विकराल बनाया है।
विशेषज्ञों और आंदोलनकारियों का मानना है कि देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाए रखने की ऐतिहासिक भूल ने ही सीमांत क्षेत्रों के विकास की कमर तोड़ी है। रोचक तथ्य यह है कि दीक्षित आयोग ने सालों पहले अपनी रिपोर्ट में बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी का हवाला देकर देहरादून के पक्ष में तर्क दिए थे, लेकिन आंदोलनकारी इसे जनभावनाओं का अपमान मानते हैं।
मनमोहन शर्मा ने सरकार को सीधी चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ठोस लिखित आश्वासन नहीं मिला, तो यह आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंचेगा। उन्होंने साफ किया कि रणनीति तैयार है—पहले दिल्ली में आमरण अनशन होगा, फिर देहरादून के घंटाघर से गैरसैंण तक नंगे पांव पदयात्रा निकाली जाएगी। यह पदयात्रा जनता को एकजुट करने का जरिया बनेगी।
इस धरने को स्थानीय युवाओं और पुराने राज्य आंदोलनकारियों का जबरदस्त साथ मिल रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि भराड़ीसैंण में करोड़ों की लागत से बना विधानसभा भवन आज धूल फांक रहा है क्योंकि वहां नौकरशाही बैठने को तैयार नहीं है। हाल ही में कुछ विधायकों ने तो वहां ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक ठंड का बहाना बनाकर सत्र देहरादून शिफ्ट करने तक की पैरवी की थी, जिससे जनमानस में भारी आक्रोश है।
धरना स्थल पर प्रमुख रूप से विनोद रतूड़ी, सुधीर गैरोला और कुलदीप अग्रवाल जैसे नेता डटे हुए हैं। इनके साथ ही आनंद राम, सचिन थपलियाल, मुकुल शर्मा, अरुण शर्मा, कपिल पंवार, राहुल रूहेला और बिट्टू ने भी आंदोलन को अंतिम मुकाम तक ले जाने की कसम खाई है। आंदोलनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक गैरसैंण के माथे पर ‘स्थायी’ शब्द नहीं सजेगा, यह लड़ाई थमेगी नहीं।






