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देवपथ एक्सक्लूसिव रिपोर्ट : ‘धाकड़’ धामी के 5 साल और पहाड़ का ‘सदाबहार’ हाल

By Rajat Sharma

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देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में ‘रिकॉर्ड’ बनने और टूटने की रफ्तार मौसम के मिजाज जैसी ही अनप्रेडिक्टेबल रही है। लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने कार्यकाल के 5 वर्ष पूरे कर एक नया राजनीतिक कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। वो सूबे के इतिहास में लगातार 5 साल पूरे करने वाले भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बन चुके हैं। सरकार ने ‘सेवा, सुशासन और समर्पण: जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ जैसे भव्य उत्सवों के साथ इसका जश्न भी मनाया और साल 2035 तक उत्तराखंड को पूरी तरह आत्मनिर्भर राज्य बनाने का महत्वाकांक्षी ब्लूप्रिंट भी जनता के सामने रख दिया है।

लेकिन, जब कोई सरकार 5 साल की मजबूत पारी खेल चुकी हो, तो जनता की उम्मीदों का ‘ऑडिट’ होना भी लाजिमी है। आइए, बिना किसी लाग-लपेट के, आंकड़ों और धरातल के चश्मे से विश्लेषण करते हैं कि इन 5 सालों में देवभूमि ने क्या पाया, क्या खोया और सरकार के ‘धाकड़’ दावों में कितनी सियासी कशिश है।

उत्तराखंड की जनता ने जब-जब ‘डबल इंजन’ की बात सुनी, तब-तब दिल्ली से देहरादून तक विकास की एक तेज रफ्तार एक्सप्रेस की कल्पना की। अगर बड़े कैनवास पर देखें, तो राज्य को कुछ ऐसी सौगातें मिली हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। ऑल वेदर रोड परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का तेजी से बढ़ता काम और सीमांत क्षेत्रों को देश के ‘पहले गांव’ के रूप में पहचान मिलना, इस सरकार के खाते की बड़ी उपलब्धियां हैं। इसके साथ ही, धामी सरकार ने देश का सबसे सख्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून और ऐतिहासिक समान नागरिक संहिता (UCC) को पारित कर अपनी एक मजबूत और कड़क छवि बनाने की पूरी कोशिश की है। लेकिन यहाँ एक नीतिगत कटाक्ष भी है कि बड़े-बड़े कानून और राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियां अपनी जगह हैं, पर क्या ये नीतियां आम पहाड़वासी की रोजमर्रा की थाली का संकट दूर कर पाईं? राष्ट्रीय नीतियां और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स निश्चित रूप से राज्य की रीढ़ मजबूत करते हैं, लेकिन जब तक स्थानीय रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर इनका सीधा असर नहीं दिखता, तब तक आम जनता के लिए ये ‘बड़ी बातें’ केवल अखबारों की सुर्खियां ही बनी रहती हैं।

‘धाकड़’ विशेषण मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्रशासनिक बोल्डनेस के लिए दिया गया और पिछले 5 वर्षों में उनके नेतृत्व में कई साहसिक फैसले भी हुए। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नए सर्किट्स, ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ के लिए सिंगल-विंडो सिस्टम और हाल ही में ऊर्जा संरक्षण के लिए कैबिनेट से पास हुई ‘नो व्हीकल डे’ जैसी पर्यावरण-हितैषी पहल भी सराहनीय हैं। मगर सच्चाई यह है कि उत्तराखंड की आत्मा इसके दूरदराज के पहाड़ी जिलों में बसती है। विपक्षी दल लगातार आरोप लगा रहे हैं कि पहाड़ों में आज भी स्वास्थ्य, शिक्षा और पानी की किल्लत वैसी ही बनी हुई है। पहाड़ों से पलायन आज भी एक कड़वी हकीकत है; नैनीताल या देहरादून के मैदानी इलाकों में जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्रों के ‘भूतिया गांवों’ की वीरानी कम नहीं हुई। सरकार का फोकस पर्यटन और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर तो है, लेकिन रिवर्स-पलायन के लिए जो ठोस नीतियां और स्थानीय सूक्ष्म उद्योग चाहिए थे, वे अभी भी फाइलों से बाहर आने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। धाकड़ फैसलों का असर तब माना जाएगा, जब पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी सचमुच पहाड़ के काम आने लगेगी।

इसी के साथ, उत्तराखंड की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा अब ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में तब्दील होता दिख रहा है। चाहे वह देहरादून के परेड ग्राउंड में ‘जन-जन की सरकार’ का भव्य आयोजन हो या बड़े-बड़े इन्वेस्टर समिट्स, इन कार्यक्रमों में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और हजारों की भीड़ जुटाई जाती है।

लोकतंत्र में जनता को अपनी ताकत और विकास का अहसास कराने के लिए रैलियां जरूरी हो सकती हैं, लेकिन भीड़ जुटाने की इस कला को ‘जीडीपी ग्रोथ’ का पैमाना नहीं माना जा सकता। यदि रोजाना नए कार्यक्रमों के आयोजन और मंच से की जाने वाली घोषणाओं से ही प्रदेश का विकास होना होता, तो आज उत्तराखंड विकास सूचकांकों में बहुत आगे निकल चुका होता। जनता अब केवल तालियां बजाने के लिए नहीं, बल्कि अपने बच्चों के लिए सुरक्षित और स्थायी रोजगार के लिए सरकार की तरफ देख रही है, क्योंकि पहाड़ों में निवेश अभी भी मैदानी जिलों की तुलना में बेहद सीमित है।

जहां तक मुख्यमंत्री की बात है, तो व्यक्तिगत तौर पर उनकी छवि एक बेहद सुलभ, विनम्र और युवा नेता की रही है और वे अक्सर आम लोगों के बीच जाकर संवाद करते भी दिखते हैं। लेकिन असली सवाल संगठन और पूरी नौकरशाही के ढांचे का है। मुख्यमंत्री भले ही जन-जन के द्वार पहुंच जाएं, लेकिन एक आम पहाड़ी बुजुर्ग या बेरोजगार युवा के लिए देहरादून सचिवालय के गलियारों में बैठे अफसरों तक अपनी बात पहुंचाना आज भी टेढ़ी खीर है। जब नीतियां नौकरशाही के चंगुल में फंस जाती हैं, तो मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत सुलभता भी एक सीमा के बाद बेअसर होने लगती है। आम आदमी आज भी तहसील और जिला मुख्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर है। जनता का सवाल सीधा है कि यदि मुख्यमंत्री तक पहुंच आसान है, तो आम जनमानस की समस्याओं के निस्तारण की रफ्तार ‘धाकड़’ क्यों नहीं है?

मुख्यमंत्री धामी ने साल 2035 तक उत्तराखंड को एक विकसित राज्य बनाने का जो संकल्प लिया है, वह दूरगामी और स्वागत योग्य है। लेकिन इस लक्ष्य को पाने के लिए केवल कड़े कानून और भव्य समारोह काफी नहीं होंगे। सरकार को अपनी प्राथमिकताओं को सचिवालय की चकाचौंध से हटाकर धारचूला, थलीसैंण और कपकोट के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति की बुनियादी जरूरतों की तरफ मोड़ना होगा।

उत्तराखंड की जागरूक जनता विकास की भूखी है, नारों की नहीं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इवेंट्स के खुमार से बाहर निकलकर धरातल पर कितनी वास्तविक ‘धाक’ जमा पाती है।

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