देहरादून में खूनी सड़क जंग: रिटायर्ड ब्रिगेडियर की मौत ने हिलाया उत्तराखंड, क्या सुरक्षित है राजधानी?
देहरादून (ब्यूरो): उत्तराखंड की राजधानी में कानून व्यवस्था के दावों की धज्जियां उड़ चुकी हैं। अब आलम यह है कि घर के बाहर टहलने निकला एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी भी सुरक्षित नहीं है। देहरादून के राजपुर इलाके में सोमवार सुबह जो हुआ, उसने पूरे प्रदेश को दहला दिया है। दो गुटों के बीच सड़क पर चल रही वर्चस्व की जंग और अंधाधुंध गोलीबारी के बीच एक निर्दोष रिटायर्ड ब्रिगेडियर की जान चली गई। इस घटना ने धामी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सीधा हमला बोला है। दसौनी ने कहा कि आज प्रदेश में न तो पुलिस कस्टडी में कोई सुरक्षित है, न बुजुर्ग और न ही देश की रक्षा करने वाले पूर्व सैनिक। रिटायर्ड ब्रिगेडियर वीके जोशी की हत्या महज एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के इकबाल के खत्म होने का प्रमाण है।
तथ्यों की गहराई में जाएं तो यह वारदात देहरादून के जौहरी गांव की है। यहां दिल्ली नंबर की एक फॉर्च्यूनर और एक स्कॉर्पियो के बीच सड़क पर ही खूनी रेस चल रही थी। स्कॉर्पियो सवार हमलावरों ने फॉर्च्यूनर पर फायरिंग शुरू कर दी। इसी क्रॉस फायरिंग के बीच सुबह की सैर पर निकले 70 वर्षीय ब्रिगेडियर वीके जोशी को सीने में गोली लग गई। उन्हें तत्काल मैक्स अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हैरानी की बात यह है कि अपराधी दिनदहाड़े गोलीबारी कर फरार हो गए और पुलिस केवल लकीर पीटती रह गई।
गरिमा दसौनी ने हालिया घटनाओं की कड़ी जोड़ते हुए सरकार की संवेदनहीनता पर प्रहार किया। उन्होंने नानकमत्ता का जिक्र किया, जहां पुलिस दबिश के दौरान एक 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला सुखदेव कौर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि पुलिस की धक्का-मुक्की ने उनकी जान ली। वहीं, रायपुर थाने की हवालात में पीआरडी जवान सुनील रतुड़ी की मौत ने पुलिसिया तंत्र के क्रूर चेहरे को बेनकाब कर दिया है। पुलिस इसे आत्महत्या बता रही है, जबकि परिवार इसे कस्टोडियल डेथ मानकर इंसाफ की गुहार लगा रहा है।
कांग्रेस नेत्री ने सवाल उठाया कि जब राज्य में पिछले 9 साल से भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार है, तो फिर ये हालात क्यों हैं? खुद कैबिनेट मंत्री के परिजन जब व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, तो आम जनता किससे उम्मीद करे? देहरादून जो कभी अपनी शांति के लिए जाना जाता था, आज वहां चापड़ से गले रेते जा रहे हैं और बोरे में लाशें मिल रही हैं। पत्रकारों पर हमले और खाकी के साये में होने वाली मौतें राज्य की बदहाल तस्वीर पेश कर रही हैं।
उत्तराखंड की सुरक्षा पर लग रहे ये दाग आने वाले दिनों में सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनने वाले हैं। गरिमा दसौनी ने साफ लहजे में पूछा है कि आखिर धामी सरकार कब तक बयानबाजी के पीछे अपनी नाकामियों को छिपाती रहेगी? क्या अब राज्य के नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए भगवान भरोसे हैं?







