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Harak Singh Rawat controversy : हरक सिंह की टिप्पणी पर बवाल, भाजपा ने 1984 सिख दंगों से जोड़ा

By Rajat Sharma

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Harak Singh Rawat controversy : उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक पुराना और बेहद संवेदनशील मुद्दा फिर से गरमा गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने सिख समाज को लेकर एक ऐसी टिप्पणी कर दी, जिसने पूरे राज्य में आक्रोश की लहर पैदा कर दी।

भाजपा ने इसे कांग्रेस की उसी पुरानी “घृणित मानसिकता” का प्रमाण बताया, जो 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती है। आइए समझते हैं कि आखिर मामला क्या है और क्यों ये विवाद इतना गहरा हो गया।

हरक सिंह रावत की टिप्पणी ने क्यों लगाई आग?

हरक सिंह रावत उत्तराखंड के सबसे अनुभवी और चर्चित नेताओं में से एक हैं। वे कई बार मंत्री रह चुके हैं और अभी कांग्रेस की प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम में उन्होंने सिख समाज को लेकर कुछ ऐसा कह दिया, जिसे भाजपा ने बेहद आपत्तिजनक और अपमानजनक बताया।

हरक ने बाद में सफाई दी कि उनका बयान मजाक में था, लेकिन भाजपा का कहना है कि मजाक के नाम पर भी किसी सम्मानित समुदाय का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस बयान के बाद सिख संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई और कांग्रेस नेताओं से माफी की मांग की। कई कांग्रेस नेता गुरुद्वारों में जाकर माथा टेकते दिखे, लेकिन भाजपा ने इसे महज दिखावा करार दिया।

भाजपा का हमला: 1984 के दंगों से जोड़कर कांग्रेस को घेरा

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और पूर्व मंत्री खजान दास ने इस पूरे मामले को 1984 के सिख नरसंहार से जोड़ते हुए कांग्रेस पर करारा प्रहार किया। उनका कहना है कि आज भी कांग्रेस के अंदर वही सोच बची हुई है, जिसने कभी हजारों निर्दोष सिखों की जान ली थी।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली सहित कई शहरों में भयानक दंगे हुए थे। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार करीब 3000 सिख मारे गए थे, जबकि कई स्वतंत्र रिपोर्ट्स इसे 8000 से ज्यादा बताती हैं।

उस समय कांग्रेस की केंद्र सरकार थी और कई नेताओं पर दंगाइयों को उकसाने व बचाने के गंभीर आरोप लगे। सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर जैसे नेताओं के नाम आज भी उन दर्दनाक यादों से जुड़े हैं। नानावटी आयोग ने भी कई कांग्रेस नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

खजान दास ने कहा कि कांग्रेस चाहे जितनी बार गुरुद्वारे के चक्कर लगा ले, लेकिन सिख समाज और देश की जनता उस काले अध्याय को कभी भूल नहीं सकती। उन्होंने हरक सिंह से सवाल किया कि क्या वे अपने “वोट बैंक” वाले किसी दूसरे समुदाय के लिए ऐसी टिप्पणी करने की हिम्मत कर सकते थे? जवाब सबको पता है – बिल्कुल नहीं।

मजाक या सोची-समझी मानसिकता?

भाजपा का सबसे बड़ा सवाल यही है कि हरक सिंह ने जब सफाई दी कि “मैंने तो मजाक में कहा था”, तो क्या सोच-समझकर किया गया मजाक भी अपमान नहीं होता? उनके अनुसार ये बयान गलती से नहीं, बल्कि कांग्रेस के अंदर बैठी उस सोच का प्रमाण है जो सिख समाज को सम्मान की नजर से नहीं देखती।

उत्तराखंड में सिख आबादी करीब 2.5 प्रतिशत है, लेकिन राज्य के कई इलाकों विशेषकर तराई क्षेत्र में उनकी अच्छी-खासी मौजूदगी है। राजनीतिक रूप से भी सिख वोट किसी भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भाजपा इसे मौका मानकर कांग्रेस को लगातार घेर रही है कि वो दिखावे की माफी से कुछ नहीं होने वाला।

सिख समाज का दर्द और राजनीति का खेल

सिख समुदाय के लिए 1984 का दंगा सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक जख्म है जो आज भी ताजा है। पिछले कई सालों में न्याय की लड़ाई लड़ी गई, कुछ दोषियों को सजा भी हुई, लेकिन कई बड़े नाम अभी भी बाहर हैं। ऐसे में जब कोई नेता मजाक के नाम पर भी संवेदनशील बात कहता है, तो पुराने घाव हरे हो जाते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये विवाद 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के बीच ध्रुवीकरण का नया हथियार बन सकता है। भाजपा इसे कांग्रेस की कमजोरी दिखाने के लिए इस्तेमाल कर रही है, वहीं कांग्रेस इसे दबाने की पूरी कोशिश में है।

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