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Karwa Chauth Water Ritual : करवा चौथ के बाद मां बच्चे को देती हैं जूठा पानी, जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व

By Rajat Sharma

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Karwa Chauth Water Ritual : हिंदू धर्म में करवा चौथ का व्रत बेहद पवित्र और भावनात्मक माना गया है। इस खास दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना से सूर्योदय से लेकर चंद्रमा निकलने तक निर्जला उपवास रखती हैं।

यह व्रत केवल प्रेम और समर्पण का प्रतीक नहीं, बल्कि पारिवारिक एकता और आस्था का भी सुंदर उदाहरण है। इस वर्ष करवा चौथ 10 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं सुबह सरगी ग्रहण करने के बाद पूरे दिन जल भी नहीं पीतीं।

शाम को जब चांद निकलता है, तब वे छलनी से चंद्र दर्शन करती हैं, करवा माता की पूजा करती हैं और पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत तोड़ती हैं।

लेकिन क्या आपने कभी यह सुना है कि कुछ स्थानों पर महिलाएं अपने जूठे पानी को बच्चे को पिलाती हैं?

इस परंपरा के पीछे एक गहरी धार्मिक मान्यता छिपी है, जो वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। आइए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है।

करवा चौथ के बाद मांएं बच्चे को जूठा पानी क्यों पिलाती हैं?

कहते हैं, करवा चौथ के दिन मां का तप और व्रत इतना शक्तिशाली होता है कि उस दिन उसके द्वारा किया गया हर कर्म परिवार के कल्याण से जुड़ जाता है।

इसीलिए कई परंपराओं में माना जाता है कि व्रत तोड़ने के बाद मां का बचा हुआ जल बच्चे को पिलाने से बच्चे की अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

यह जल तांबे के बर्तन में रखा होना शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे बच्चे की रक्षा होती है और उसके जीवन में संकट नहीं आते।

हालांकि, यह केवल धार्मिक आस्था और लोक परंपरा है इसके वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। लेकिन आस्था में जो शक्ति होती है, वह लोगों के दिलों में विश्वास को गहराई से जोड़ देती है।

पति-पत्नी और संतान के रिश्ते का प्रतीक

करवा चौथ का व्रत केवल पति-पत्नी के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार के कल्याण की कामना का प्रतीक है।

जब मां अपने बच्चे को यह जल पिलाती है, तो वह अनजाने में यह कामना करती है कि जैसे उसने अपने पति के लिए लंबी उम्र की प्रार्थना की, वैसे ही उसके बच्चे का जीवन भी लंबा और सुखमय रहे।

धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि पतिव्रता स्त्री का व्रत और आशीर्वाद संतान को भी सुरक्षा देता है। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी कई घरों में श्रद्धा से निभाई जाती है।

भगवान गणेश जी और यह मान्यता

किंवदंती के अनुसार, एक बार भगवान गणेश ने माताओं को यह वरदान दिया था कि  “जब कोई स्त्री करवा चौथ का व्रत करे, पूरे दिन निर्जला रहे और शाम को चंद्र दर्शन के बाद पति से जल ग्रहण करे, तो व्रत के समय बचा हुआ वह जल यदि वह अपने बच्चे को पिला दे, तो उस बालक की कभी भी अकाल मृत्यु नहीं होगी।”

गणेश जी के इस वरदान के बाद से यह परंपरा घर-घर में मान्य हो गई। माना जाता है कि गणेश जी स्वयं इस दिन माताओं की प्रार्थना सुनते हैं और उनके परिवार को लंबी आयु का आशीर्वाद देते हैं।

आस्था और परंपरा का संतुलन

आज के समय में भले ही कई लोग इस परंपरा को प्रतीकात्मक रूप में निभाते हों, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश बेहद सुंदर है —

मां की ममता, आस्था और अपने परिवार के प्रति समर्पण। करवा चौथ के दिन केवल पति की लंबी उम्र की कामना ही नहीं की जाती, बल्कि पूरा परिवार एक भावनात्मक बंधन में जुड़ जाता है।

इसीलिए व्रत के बाद बच्चे को मां का जूठा जल पिलाना केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्नेह और शुभता का प्रतीक भी है।

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