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राज्यपालों की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट का करारा तमाचा, अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते बिल

By Rajat Sharma

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Supreme Court Governor Bills Judgment : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बड़े फैसले में साफ कर दिया कि राज्यपाल राज्य विधानसभाओं से पास हुए बिलों को हमेशा के लिए लटकाकर नहीं रख सकते। ऐसा करना संवैधानिक सिस्टम को कमजोर बनाता है और लोकतंत्र की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाता है। कोर्ट ने कहा कि लंबी देरी न सिर्फ डेमोक्रेटिक प्रोसेस को प्रभावित करती है, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारियों के भी खिलाफ है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ये भी क्लियर कर दिया कि वो राज्यपाल या राष्ट्रपति को बिलों पर फैसला लेने के लिए कोई फिक्स्ड टाइम लिमिट नहीं तय कर सकता। क्योंकि ऐसा करना कोर्ट के दायरे से बाहर होगा और ‘पावर सेपरेशन’ यानी शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत को तोड़ने वाला कदम होगा।

पांच जजों की बेंच ने सुनाया सर्वसम्मति से फैसला

प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने ये फैसला ‘राष्ट्रपति रेफरेंस’ मामले में सुनाया। ये मामला राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए बिलों पर एक्शन लेने की टाइम लिमिट से जुड़ा था। बेंच में जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर भी शामिल थे।

कोर्ट ने कहा कि अगर राज्यपाल को अनुच्छेद 200 की सही तरीके से फॉलो किए बिना बिलों को रोकने की छूट दी गई, तो ये फेडरलिज्म यानी संघवाद के खिलाफ होगा। अनुच्छेद 200 में राज्यपाल की पावर बताई गई है कि वो विधानसभा से पास बिलों को अप्रूव करें। कोर्ट ने साफ कहा – हमें नहीं लगता कि राज्यपालों के पास विधानसभा से पास बिलों को अनलिमिटेड समय तक लंबित रखने का हक है।

राज्यपाल के पास सिर्फ तीन ऑप्शन

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि राज्यपाल के पास सिर्फ तीन रास्ते हैं – या तो बिल को अप्रूवल दे दें, या पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस भेज दें, या फिर राष्ट्रपति के पास रेफर कर दें। इसके अलावा कोई चौथा रास्ता नहीं है।

कोर्ट ने आगे कहा कि हमारे लोकतांत्रिक देश में राज्यपालों के लिए सख्त टाइम लिमिट लगाना संविधान की लचीलेपन वाली स्पिरिट के खिलाफ है। हां, बिलों को अनिश्चितकाल तक रोककर रखना गलत है, लेकिन टाइम लिमिट तय करना पावर सेपरेशन को कुचलने जैसा होगा।

राष्ट्रपति ने क्यों भेजा था रेफरेंस?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या कोर्ट राज्यपालों और राष्ट्रपति को राज्य विधानसभाओं से पास बिलों पर एक फिक्स्ड समय के अंदर फैसला लेने का ऑर्डर दे सकता है? ये सवाल अप्रैल 2025 के उस फैसले के बाद आया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा लंबित बिलों पर कमेंट किया था।

सीजेआई बीआर गवई की अध्यक्षता वाली इसी पांच जजों की बेंच ने सभी पक्षों की दलीलें लगातार 10 दिनों तक सुनीं। सुनवाई खत्म होने के बाद 11 सितंबर को फैसला रिजर्व कर लिया गया था और आज गुरुवार को इसे सुना दिया गया।

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