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Former IPS Lokeshwar Singh : उत्तराखंड पुलिस पर सवाल, पूर्व आईपीएस पर हिरासत में पीटने का आरोप सिद्ध

By Rajat Sharma

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Former IPS Lokeshwar Singh : उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में हुई एक घटना ने पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां के एक स्थानीय निवासी लक्ष्मीदत्त जोशी ने आरोप लगाया कि उन्हें पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में गैरकानूनी तरीके से रोका गया, कपड़े उतारकर पीटा गया और घंटों तक वहां रखा गया।

यह मामला अब राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के फैसले के साथ सुर्खियों में है, जहां पूर्व आईपीएस अधिकारी लोकेश्वर सिंह को दोषी ठहराया गया है। यह फैसला पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी और आम नागरिकों के अधिकारों पर रोशनी डालता है, खासकर ऐसे समय में जब भारत में पुलिस हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट में 2022 में पुलिस हिरासत में 74 मौतें दर्ज हुईं, जो पुलिस सुधार की जरूरत को उजागर करती है।

घटना की पृष्ठभूमि और शिकायत

यह सब फरवरी 2023 में शुरू हुआ, जब पिथौरागढ़ के पुराने बाजार में मंगलम गारमेंट्स चलाने वाले लक्ष्मीदत्त जोशी को पूछताछ के बहाने पुलिस अधीक्षक कार्यालय बुलाया गया। उस समय लोकेश्वर सिंह पिथौरागढ़ के पुलिस अधीक्षक थे। जोशी का कहना है कि उन्हें वाहनों में आग लगाने की एक घटना से जोड़कर बुलाया गया, लेकिन वहां पहुंचने पर उनके साथ बुरा बर्ताव किया गया।

उन्होंने नैनीताल के जिला पुलिस शिकायत प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें चोटों की मेडिकल रिपोर्ट और एक्स-रे शामिल थे। ये दस्तावेज साबित करते हैं कि उन्हें गंभीर चोटें आईं, जिनका इलाज लंबे समय तक चला। पुलिस शिकायत प्राधिकरण जैसी संस्थाएं भारत में पुलिस की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए बनी हैं, जो 2005 के पुलिस एक्ट के तहत काम करती हैं और नागरिकों को न्याय का रास्ता देती हैं।

आरोपी अधिकारी का पक्ष और बचाव

लोकेश्वर सिंह ने अपना बचाव करते हुए कहा कि जोशी का आपराधिक इतिहास है। उनके खिलाफ पिथौरागढ़ और चंपावत में कई मामले दर्ज हैं, जैसे सरकारी काम में बाधा, मारपीट और धमकी। सिंह के मुताबिक, जोशी को सिर्फ पूछताछ के लिए बुलाया गया था और कोई हिंसा नहीं हुई। लेकिन जोशी ने इसका जवाब देते हुए दावा किया कि ये सारे मामले झूठे हैं, जो राजनीतिक दबाव और पद के दुरुपयोग से दर्ज कराए गए।

उन्होंने बताया कि उनके खिलाफ कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है और मुकदमे अभी अदालत में चल रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि एक पीड़ित पुलिस विभाग में सफाई कर्मचारी का बेटा है, जो इस मामले को और जटिल बनाता है। ऐसे आरोप पुलिस की छवि पर असर डालते हैं और उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां पहाड़ी इलाकों में पुलिस पहुंच सीमित है, विश्वास बनाना और भी मुश्किल हो जाता है।

प्राधिकरण की सुनवाई और अंतिम निर्णय

करीब तीन साल चली इस सुनवाई में दोनों पक्षों को बार-बार बुलाया गया, ताकि वे अपना पक्ष रख सकें। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण की बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति एनएस धानिक अध्यक्ष थे और अन्य सदस्य शामिल थे, ने सबूतों की जांच की। उन्होंने पाया कि लोकेश्वर सिंह ने जोशी को कार्यालय में बुलाकर गैरकानूनी तरीके से पीटा, कपड़े उतरवाए और लंबे समय तक रोका।

इस आधार पर प्राधिकरण ने सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश उत्तराखंड सरकार के गृह विभाग को भेजी। साथ ही, सरकार को निर्देश दिया कि कार्रवाई करते हुए सिंह को उचित सुनवाई का मौका दिया जाए। यह फैसला पुलिस सुधार की दिशा में एक कदम है, क्योंकि भारत में पुलिस अधिकारी अक्सर जवाबदेही से बच जाते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2023 में पुलिस से जुड़े 1,500 से ज्यादा मामले सामने आए, जिनमें से कई में कार्रवाई नहीं हुई।

पूर्व आईपीएस की वर्तमान स्थिति

लोकेश्वर सिंह ने अक्टूबर 2025 में पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया। अब वे संयुक्त राष्ट्र से जुड़े एक राष्ट्रीय संगठन में काम कर रहे हैं। यह बदलाव उनके करियर में एक नया मोड़ है, लेकिन इस मामले का असर उनकी छवि पर पड़ सकता है। उत्तराखंड सरकार अब इस सिफारिश पर क्या कदम उठाती है, यह देखना बाकी है। ऐसे मामलों से साफ होता है कि पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता और न्याय की कितनी जरूरत है, ताकि आम लोग बिना डर के अपनी बात रख सकें।

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