Pithoragarh : उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में वन्यजीवों के साथ इंसानों के टकराव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में बेरीनाग इलाके में एक तेंदुए ने शाम के समय एक युवा लड़के पर हमला कर दिया, जिससे स्थानीय लोग अब सतर्क हो गए हैं। यह घटना रीठा रैतौली गांव में हुई, जहां जंगलों की निकटता के कारण ऐसी समस्याएं आम हो चली हैं। आइए जानते हैं कि क्या हुआ और वन विभाग ने कैसे प्रतिक्रिया दी।
शाम की सैर बनी खतरे की घड़ी
कल शाम को ठांगा गांव का रहने वाला 16 साल का अमित सिंह बोरा बाजार से घर लौट रहा था। स्कूल के पास से गुजरते हुए अचानक एक तेंदुए ने उस पर झपट्टा मार दिया। लड़के की चीख-पुकार सुनकर परिवार वाले दौड़े-भागे आए और शोर मचाने पर तेंदुआ जंगल की ओर भाग गया। अमित के हाथों और शरीर के अन्य हिस्सों में गहरे घाव हो गए, लेकिन सौभाग्य से जान को कोई बड़ा खतरा नहीं हुआ।
परिवार ने तुरंत उसे बेरीनाग के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाकर इलाज करवाया, जहां डॉक्टरों ने घावों की मरहम-पट्टी की। इस तरह की घटनाएं उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बढ़ती जा रही हैं, जहां जंगलों का कटाव और मानव बस्तियों का फैलाव वन्यजीवों को इंसानों के करीब ला रहा है। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में तेंदुओं के हमलों में 20-30% की वृद्धि दर्ज की गई है, जो पर्यावरण असंतुलन की ओर इशारा करती है।
ग्रामीणों की मांग और वन विभाग का एक्शन
घटना की खबर फैलते ही गांव की प्रधान निशा धारियाल ने वन अधिकारियों से तेंदुए को पकड़ने की गुहार लगाई। रात होते-होते वन विभाग की टीम मौके पर पहुंच गई और इलाके में गश्त शुरू कर दी। उन्होंने लाउडस्पीकर से लोगों को शाम ढलने के बाद अकेले बाहर न निकलने की हिदायत दी। खासतौर पर बच्चों और युवाओं को समय पर घर लौटने और महिलाओं को जंगल में अकेले घास काटने न जाने की सलाह दी गई।
वन क्षेत्राधिकारी चंदा मेहरा ने बताया कि टीम लगातार निगरानी कर रही है और लोगों को जागरूक बनाने का काम जारी है। उन्होंने घरों के आसपास झाड़ियां साफ करने और रात में रोशनी का इंतजाम करने की अपील भी की। ऐसे कदम न सिर्फ तात्कालिक राहत देते हैं, बल्कि लंबे समय में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में मदद करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रैप कैमरे और ट्रैंक्विलाइजर जैसी तकनीकों से ऐसे जानवरों को सुरक्षित तरीके से हटाया जा सकता है।
थल-चौसला में भालू का खौफ फैला
इसी बीच, थल-चौसला इलाके में भालू की दहशत ने ग्रामीणों की नींद उड़ा दी है। भटीगांव, हीपा और दडमौली जैसे गांवों में भालू बार-बार दिखाई दे रहे हैं, जिससे लोग घरों में कैद होकर रह गए हैं। महिलाएं अब जंगल में घास काटने या जानवर चराने से कतरा रही हैं, और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है।
भालू न सिर्फ फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि कभी-कभी इंसानों पर भी हमला कर सकते हैं। उत्तराखंड में भालू की आबादी करीब 2,000 के आसपास है, लेकिन घटते जंगलों के कारण वे बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। ग्रामीणों ने वन विभाग से इस समस्या का समाधान मांगते हुए कहा कि अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
भालू से फसलें बर्बाद, महिलाओं का डर
भटीगांव के मनोज पाठक ने साझा किया कि हाल ही में एक भालू ने उनके माल्टा और संतरे के पेड़ों को बुरी तरह तोड़-फोड़ दिया। इसी तरह देवराज रौतेला की फसलें भी गिराकर बर्बाद हो गईं। चौसला की दो महिलाएं, कला कार्की और सरिता कार्की, काम से लौटते वक्त जंगल में भालू से आमना-सामना हो गया। शोर मचाने पर वह भाग गया, लेकिन इस घटना ने पूरे इलाके में डर पैदा कर दिया।
वन रेंजर चंदा मेहरा ने बताया कि टीम को भटीगांव और चौसला भेजा गया है, जहां वे लोगों को भालू से बचाव के तरीके सिखा रही हैं। इसमें शोर मचाना, समूह में जाना और जंगलों में सावधानी बरतना शामिल है। पर्यावरणविदों का मानना है कि जंगलों का संरक्षण और वन्यजीवों के लिए अलग गलियारे बनाना ही स्थायी समाधान है, वरना ऐसे टकराव बढ़ते रहेंगे।
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