Jivitputrika Vrat 2025 : भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि पर मनाया जाने वाला जितिया व्रत (जीवितपुत्रिका व्रत) इस साल 14 सितंबर, रविवार को रखा जाएगा।
परंपरा के अनुसार 13 सितंबर को महिलाएं नहाय-खाय करेंगी, जबकि 14 सितंबर को पूरे दिन निर्जला उपवास रखा जाएगा। व्रत का समापन 15 सितंबर की सुबह पारण से होगा।
मान्यता है कि यह कठिन तपस्या माताएं अपने पुत्रों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन की कामना के लिए करती हैं।
यह व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक चलता है।
व्रत की शुरुआत : नहाय-खाय
जितिया व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती महिलाएं सात्विक भोजन करती हैं।
इसके बाद अगले दिन निर्जला उपवास की कठोर साधना निभाई जाती है।
धार्मिक कथा और महत्व
जितिया व्रत का वर्णन महाभारत में भी मिलता है। कथा के अनुसार जब अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे बालक को ब्रह्मास्त्र से मारने का प्रयास किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उस शिशु को गर्भ में ही दोबारा जीवन दिया।
इसलिए उसका नाम ‘जीवित पुत्रिका’ रखा गया, जो बाद में राजा परीक्षित कहलाए। तभी से इस व्रत को जीवितपुत्रिका या जितिया कहा जाने लगा।
ओठगन और उपवास की परंपरा
नहाय-खाय के बाद महिलाएं ओठगन की रस्म निभाती हैं और निर्जला उपवास करती हैं। यह व्रत संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है।
पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 14 सितंबर सुबह 8:41 बजे से शुरू होकर 15 सितंबर सोमवार सुबह 6:27 बजे तक रहेगी।
इसीलिए उपवास 14 सितंबर को रखा जाएगा और 15 सितंबर को सुबह पारण के साथ पूर्ण होगा।
विशेष परंपराएं
व्रत से पहले नोनी का साग खाने की परंपरा है। मान्यता है कि इसमें आयरन और कैल्शियम भरपूर मात्रा में होता है, जिससे उपवास के दौरान कमजोरी महसूस नहीं होती।
पारण के बाद महिलाएं लाल धागा या लॉकेट गले में धारण करती हैं।
पूजा के समय सरसों का तेल और खल चढ़ाने की परंपरा है। व्रत के बाद यही तेल बच्चों के सिर पर आशीर्वाद स्वरूप लगाया जाता है।











