Jitiya Vrat Puja Vidhi : आज रविवार को देशभर की महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना के लिए जीतिया व्रत रखेंगी।
इसे जीवित्पुत्रिका या जीउतपुत्रीका व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है।
पंचांग के अनुसार, शनिवार को ‘नहाय-खाय’ की परंपरा निभाई गई और रविवार को महिलाएं व्रत का संकल्प लेकर निर्जला उपवास करेंगी।
जीतिया व्रत का महत्व
इस दिन माताएं अपने पुत्र की लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना के लिए कठोर नियमों के साथ व्रत करती हैं।
यह व्रत सिर्फ उपवास ही नहीं, बल्कि संतान के प्रति मां के प्रेम और आस्था का प्रतीक है।
व्रत की शुरुआत कैसे होती है?
व्रत से एक दिन पहले ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के बाद अन्न, जल और फल ग्रहण करने का नियम है।
कई जगहों पर महिलाएं गेहूं की रोटी न खाकर महुआ या मरुआ के आटे की रोटियां खाती हैं।
इस दिन नोनी का साग खाने की भी परंपरा है।
तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन, मांस और मछली का सेवन वर्जित होता है।
अष्टमी तिथि का व्रत और पूजा
अष्टमी के दिन महिलाएं पूरे दिन और रात निर्जला व्रत रखती हैं।
शाम को राजा जीमूतवाहन की कुशा से बनी प्रतिमा की पूजा होती है।
मिट्टी और गोबर से चील व सियारिन की प्रतिमा बनाकर उन पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है।
व्रत के दौरान महिलाएं चाकू-कैंची जैसी नुकीली वस्तुओं का प्रयोग नहीं करतीं।
पूजा के समय सरसों का तेल और खाल चढ़ाने की परंपरा है। व्रत पारण के बाद यही तेल बच्चों के सिर पर लगाया जाता है।
पारण और विशेष परंपराएं
व्रत पारण के समय महिलाएं लाल रंग का धागा गले में पहनती हैं।
कई महिलाएं इसके साथ लॉकेट भी धारण करती हैं।
ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने का विशेष महत्व है।
जीतिया व्रत को लेकर आस्था है कि इसे नियमपूर्वक करने से बच्चों पर आने वाले संकट दूर हो जाते हैं और उनका जीवन खुशहाल बनता है।











