देश विदेश क्राइम उत्तराखंड मनोरंजन बिज़नेस ऑटो टेक्नोलॉजी खेल धर्म हेल्थ लाइफस्टाइल ई - पेपर

बीजेपी विधायक बनने के बाद भी कर रहे मनरेगा मजदूरी, पत्नी को भी मिला भुगतान

By Rajat Sharma

Published on:


Advertisement

उत्तराखंड के सीमांत जिले उत्तरकाशी में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। यहां की पुरोला विधानसभा सीट से चुने गए भाजपा विधायक दुर्गेश्वर लाल और उनकी पत्नी निशा के बैंक खातों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की राशि जमा होने का मुद्दा सुर्खियां बटोर रहा है।

यह योजना ग्रामीण इलाकों में गरीब परिवारों को 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराने के लिए चलाई जाती है, लेकिन एक विधायक के खाते में इसका पैसा पहुंचना कई सवाल खड़े कर रहा है।

मनरेगा योजना की पृष्ठभूमि और महत्व

मनरेगा को 2005 में शुरू किया गया था, जो ग्रामीण भारत में बेरोजगारी से लड़ने का एक बड़ा हथियार है। हाल ही में केंद्र सरकार ने इसका नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (एमजीएनआरईजीएस) करने का फैसला लिया, जिस पर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई है।

उनका कहना है कि यह योजना की मूल भावना को कमजोर कर सकता है। उत्तरकाशी जैसे पहाड़ी जिलों में यह योजना स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं।

कैसे उजागर हुआ यह मामला

दुर्गेश्वर लाल 2022 में भाजपा के टिकट पर विधायक बने थे। उससे पहले उनका मनरेगा जॉब कार्ड बना हुआ था, जिसके तहत उन्हें और उनकी पत्नी को पहले भी भुगतान मिल चुका था। लेकिन अब, जबकि वे विधायक हैं, उनके जॉब कार्ड पर नए काम दिखाए गए हैं। मनरेगा के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि जून 2022 में निशा को रेचा में सड़क निर्माण का काम मिला। फिर अगस्त-सितंबर 2024 और नवंबर 2024 में बाजुड़ी और समलाडी में वृक्षारोपण के काम सौंपे गए। यहां तक कि इस साल दुर्गेश्वर लाल को पिनेक्ची में भूमि विकास का काम दिखाया गया है।

भुगतान की रकम और विवरण

पोर्टल के अनुसार, विधायक बनने के बाद तीन कार्यों के लिए कुल 5,214 रुपये का भुगतान हुआ। वहीं, 2021 से 2025 तक के 11 कार्यों में पति-पत्नी के खातों में कुल 22,962 रुपये जमा होने का रिकॉर्ड है। यह आंकड़े योजना की पारदर्शिता को दर्शाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये काम वास्तव में किए गए? विकासखंड कार्यालय के अधिकारियों ने बताया कि यह पुराने जॉब कार्ड पर आधारित है, लेकिन कोई मस्टरोल या फाइल नहीं मिल रही, जिसमें श्रमिकों की उपस्थिति और हस्ताक्षर दर्ज हों।

विधायक का पक्ष और आरोप

दुर्गेश्वर लाल ने इस पूरे मामले को अपनी छवि खराब करने की साजिश बताया। उनका कहना है कि विधायक बनने से पहले उनका जॉब कार्ड था, लेकिन अब बिचौलियों की दुकानें बंद होने से कुछ लोग उन्हें निशाना बना रहे हैं। वे जोर देकर कहते हैं कि बिना काम किए और हस्ताक्षर के मस्टरोल जारी नहीं होता। यह दावा राजनीतिक संघर्ष को और गहरा बनाता है, जहां स्थानीय स्तर पर योजना के दुरुपयोग के आरोप आम हैं।

अधिकारियों की प्रतिक्रिया और आगे की कार्रवाई

खंड विकास अधिकारी शशि भूषण बिंजोला ने मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि जल्द ही संबंधित कर्मचारियों से पूछताछ की जाएगी और दोषियों से पूरी राशि की वसूली की जाएगी। यह कदम योजना की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है। उत्तराखंड में मनरेगा के तहत लाखों लोग लाभान्वित होते हैं, और ऐसे मामलों से आम जनता का भरोसा डगमगा सकता है।

इस घटना से क्या सीख मिलती है

यह प्रकरण मनरेगा जैसी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित करता है। ऑनलाइन पोर्टल जैसे उपकरण भ्रष्टाचार रोकने में मददगार हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर निगरानी मजबूत करने की आवश्यकता है। उत्तरकाशी जैसे जिलों में, जहां प्राकृतिक संसाधन और रोजगार सीमित हैं, ऐसी योजनाएं जीवनरेखा का काम करती हैं। उम्मीद है कि जांच से सच्चाई सामने आएगी और योजना का सही इस्तेमाल सुनिश्चित होगा।

Leave a Comment