देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में अब सिरदर्द या बुखार नहीं, बल्कि बचपन का ‘मोटापा’ सबसे बड़ी बीमारी बनकर उभर रहा है। यहां रोजाना पहुंच रहे चार नए मामले शहर के मध्यमवर्गीय परिवारों की बदलती जीवनशैली की डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं। रात के सन्नाटे में स्मार्टफोन की स्क्रीन और ऑनलाइन फूड डिलीवरी के गठजोड़ ने दून के बच्चों को हार्ट अटैक और लिवर फेलियर की दहलीज पर खड़ा कर दिया है।
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक कुमार इस संकट की जड़ ‘बेवक्त खाने’ की लत को मानते हैं। रात को देर तक ऑनलाइन गेमिंग और कंप्यूटर पर जागने वाले बच्चों के लिए ‘मिडनाइट स्नैकिंग’ एक जानलेवा आदत बन चुकी है। महीने भर भी अगर यह क्रम चल जाए, तो शरीर का मेटाबॉलिज्म पूरी तरह बिगड़ जाता है और बच्चा मोटापे का शिकार होने लगता है।
यह केवल वजन बढ़ने का मामला नहीं है, बल्कि बच्चों की धमनियों में वसा जमा होने से हृदयघात का खतरा बढ़ गया है। अस्पताल पहुंच रहे बच्चों में उच्च कोलेस्ट्रॉल के साथ-साथ लिवर सिरोसिस के लक्षण भी मिल रहे हैं। डॉ. कुमार बताते हैं कि एसजीपीटी और एजीओटी जैसे एंजाइम का बढ़ता स्तर संकेत दे रहा है कि जंक फूड बच्चों के लिवर को अंदर से खोखला कर रहा है।
अभिभावकों के लिए चिंता की बात यह भी है कि इसका सीधा असर स्कूल के रिपोर्ट कार्ड पर दिख रहा है। हार्मोनल असंतुलन के कारण बच्चे कक्षा में सुस्त रहते हैं और शिक्षकों की शिकायतें बढ़ रही हैं। आलस और एकाग्रता की कमी की वजह से दून के मेधावी छात्र भी अब अकादमिक रूप से पिछड़ रहे हैं।
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि पैकेट बंद संरक्षित खाना और गतिहीन दिनचर्या बच्चों को डायबिटीज और अस्थमा की ओर धकेल रही है। बचाव का एकमात्र रास्ता अब कड़े अनुशासन में ही छिपा है। घर में खाने की सख्त समयसारिणी बनाने और बच्चों को रोजाना कम से कम 45 मिनट शारीरिक व्यायाम कराने की सलाह दी जा रही है।






