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Credit Card Minimum Payment : क्रेडिट कार्ड बिल में दिखने वाला ‘Minimum Payment’ कैसे बढ़ाता है कर्ज़

By Rajat Sharma

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Credit Card Minimum Payment : आजकल क्रेडिट कार्ड हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। शॉपिंग हो, बिल भरना हो या अचानक कोई इमरजेंसी – ये कार्ड हर जगह काम आता है। लेकिन इसी कार्ड का एक छोटा सा ऑप्शन आपको कंगाल बनाने की ताकत रखता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बिल में लिखे उस “न्यूनतम भुगतान” (Minimum Payment Due) की। नाम है छोटा, नुकसान है बेहिसाब।

ये न्यूनतम भुगतान असल में है क्या?

महीने के अंत में जब बिल आता है और पैसे कम पड़ते हैं, तो सबसे नीचे लिखी वो छोटी सी रकम आंखों को ठंडक देती है। बैंक कहता है – बस 5% से 15% तक चुकाओ, लेट फीस (Late Fees) नहीं लगेगी और कार्ड भी एक्टिव रहेगा। लोग सोचते हैं, “चलो कम से कम इतना तो चुका देते हैं”। शुरू-शुरू में सच में राहत लगती है, लेकिन यहीं से शुरू होता है असली खेल।

जैसे ही आप Minimum Payment Due करते हैं, शुरू हो जाता है 40% तक का ब्याज

हैरानी की बात ये है कि बाकी बची राशि पर तुरंत भयंकर ब्याज लगना शुरू हो जाता है। सालाना ब्याज दर 36% से 40% तक होती है। मतलब अगर आपने 10,000 रुपये खर्च किए और सिर्फ Minimum Payment Due किया, तो एक साल में वो रकम दोगुनी से ज्यादा हो सकती है। लोग सालों तक हर महीने Minimum Payment Due करते रहते हैं, ये सोचकर कि कर्ज़ कम हो रहा है – लेकिन हकीकत में सिर्फ ब्याज ही भर रहे होते हैं। असली कर्ज (Principal Amount) वैसे का वैसा पड़ा रहता है। ये चक्रवृद्धि ब्याज (Compounding Interest) का ऐसा फंदा है कि जितना भागो, उतना ही फंसते चले जाओ।

क्रेडिट स्कोर भी हो जाता है बर्बाद

Minimum Payment Due करने से आपका Credit Card Utilisation Ratio आसमान छूने लगता है। ये रेशियो जितना ज्यादा, आपका क्रेडिट स्कोर उतना ही नीचे। एक्सपर्ट कहते हैं कि Credit Utilisation Ratio 30% से कम रखना चाहिए, वरना भविष्य में लोन लेना, नया कार्ड लेना या घर-गाड़ी का कर्ज़ लेना बेहद मुश्किल हो जाता है।

बचने का सबसे आसान और एकमात्र तरीका

सबसे सेफ तरीका है – हर महीने पूरा बिल समय पर चुकाएं। अगर किसी महीने सच में पैसे कम हैं तो भी Minimum Payment Due से ज्यादा से ज्यादा भरें। कोशिश करें कि Principal Amount तेज़ी से कम हो। क्रेडिट कार्ड को सुविधा समझें, कर्ज़ का जरिया नहीं। बजट बनाएं, खर्च पर कंट्रोल रखें और वित्तीय अनुशासन अपनाएं। यही एक तरीका है इस मीठे जहर से बचने का।

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