Chamoli : उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमालयी काले भालू लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। जंगलों के करीब बसे गांवों में भालू अक्सर बसावटों की ओर आ जाते हैं, जिससे इंसानों और मवेशियों पर हमले बढ़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भालू का सुप्तावस्था का चक्र बिगड़ रहा है, और खाने की तलाश में वे गांवों तक पहुंच रहे हैं। राज्य में पिछले कुछ सालों में ऐसे संघर्ष बढ़े हैं, और चमोली जैसे पहाड़ी इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
भालू हमलों का बढ़ता खतरा
चमोली में बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे वन क्षेत्रों में भालू की मौजूदगी ज्यादा है। यहां हाल के समय में कई दुखद घटनाएं हुई हैं, जहां भालू ने लोगों पर हमला किया और मवेशियों को नुकसान पहुंचाया। ग्रामीण शाम ढलते ही घरों में बंद हो जाते हैं, क्योंकि बाहर निकलना जोखिम भरा हो गया है।
पहले झाड़ियां काटने जैसे उपाय आजमाए गए, लेकिन समस्या जस की तस रही। उत्तराखंड में भालू हमलों से जुड़े आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं, और विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों का सिकुड़ना और मौसम की अनियमितता मुख्य कारण हैं।
एक नया और अनोखा समाधान
अब जिला पंचायत ने इस समस्या से निपटने के लिए एक नई पहल शुरू की है। वे एक विशेष भगाने वाली दवा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो तरल और दानों के रूप में उपलब्ध है। इस दवा की तेज गंध भालू को पसंद नहीं आती, इसलिए वह गांव की सीमाओं और रास्तों से दूर रहता है। अधिकारियों का कहना है कि गांवों के आसपास इस दवा का छिड़काव करने से भालू बसावटों में घुसने से हिचकिचाएगा।
इसके लिए जिला पंचायत ने छिड़काव करने वाली 60 मशीनें भी खरीदी हैं। शुरुआत में नंदानगर क्षेत्र की कुछ ग्राम पंचायतों में ट्रायल चल रहा है। जिला पंचायत अध्यक्ष और अन्य अधिकारियों ने इसे पायलट प्रोजेक्ट बताया है। अगर नतीजे अच्छे आए, तो पूरे जिले के गांवों में यह दवा और मशीनें बांटी जाएंगी।
ग्रामीणों को सीधी मदद
मुख्य विकास अधिकारी डॉ. अभिषेक त्रिपाठी ने खुद विकास भवन में ग्रामीणों को दवा के पैकेट सौंपे। उन्होंने कहा कि जंगली जानवरों से प्रभावित इलाकों में यह कदम किसानों और ग्रामीणों के लिए बड़ा सहारा बनेगा। साथ ही, अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि लोगों को दवा के सही इस्तेमाल की ट्रेनिंग दी जाए, ताकि यह ज्यादा प्रभावी हो।
अपर मुख्य अधिकारी तेज सिंह ने बताया कि यह तरीका सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल है, क्योंकि यह भालू को सिर्फ दूर रखता है, नुकसान नहीं पहुंचाता।
यह पहल न केवल स्थानीय लोगों की सुरक्षा बढ़ाएगी, बल्कि इंसान और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाने में भी मदद करेगी। उम्मीद है कि ऐसे नवाचार से चमोली जैसे इलाकों में जीवन फिर से सामान्य हो सकेगा।







