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उत्तराखंड गंगोत्री में सूखी ठंड का असर, नदी पर जमी बर्फ की मोटी परत

By Rajat Sharma

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उत्तरकाशी : उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित गंगोत्री धाम इन दिनों बेहद ठंडे मौसम की चपेट में है। दिसंबर के मध्य में ही तापमान माइनस 10 डिग्री सेल्सियस तक गिर चुका है, जिससे यहां की प्रसिद्ध भागीरथी नदी और उसके साथ बहने वाली अन्य धाराएं पूरी तरह जम गई हैं।

यह क्षेत्र हिमालय की ऊंची चोटियों से घिरा हुआ है, जहां समुद्र तल से तीन हजार मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री नेशनल पार्क प्रकृति की अनुपम सुंदरता का प्रतीक माना जाता है। यह पार्क करीब 2390 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और गंगा नदी के उद्गम स्थल गोमुख ग्लेशियर को अपने अंदर समेटे हुए है। यहां देवदार, ओक और रोडोडेंड्रॉन जैसे घने जंगलों के साथ-साथ अल्पाइन घास के मैदान भी हैं, जो दुर्लभ वन्यजीवों का सुरक्षित ठिकाना प्रदान करते हैं।

नदियां और झरने बर्फ में कैद

इस साल बारिश और बर्फबारी कम होने के बावजूद सूखी ठंड ने जोर पकड़ा है। नतीजतन, भागीरथी नदी की सतह पर मोटी बर्फ की परत जम गई है। पानी अब सिर्फ बर्फ के बीच एक पतली धारा की तरह बह रहा है। आसपास के झरने और छोटी नदियां भी पूरी तरह ठोस हो चुकी हैं, जिससे स्थानीय लोगों को पीने के पानी की दिक्कतें हो रही हैं। पाइपलाइनें जम जाने से पानी ढोना पड़ रहा है, लेकिन प्रकृति का यह नजारा देखने लायक है।

वन विभाग की टीम की बहादुरी

इतनी कड़ी सर्दी में भी गंगोत्री नेशनल पार्क के कर्मचारी अपनी ड्यूटी पर डटे हुए हैं। वे समुद्र तल से चार हजार मीटर तक की ऊंचाई पर गोमुख और केदारताल जैसे इलाकों में नियमित गश्त कर रहे हैं। पार्क इंचार्ज राजवीर रावत बताते हैं कि टीम पूरी लगन से काम कर रही है, ताकि यहां रहने वाले दुर्लभ जानवर सुरक्षित रहें।

इस पार्क में हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग, नीली भेड़, हिमालयी तहर और भूरे भालू जैसे लुप्तप्राय प्राणी पाए जाते हैं। सर्दियों में ये जानवर निचले इलाकों की ओर आते हैं, इसलिए मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका बढ़ जाती है। वन विभाग की टीमें रात में भी निगरानी रखती हैं, ताकि कोई अनहोनी न हो। यह प्रयास पार्क की जैव विविधता को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

गंगोत्री का यह मौसम प्रकृति की कठोरता और सुंदरता दोनों को एक साथ दिखाता है। जहां एक तरफ बर्फीले नजारे मन मोह लेते हैं, वहीं दूसरी तरफ यहां की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। लेकिन वन्यजीवों की रक्षा के लिए कर्मचारियों का समर्पण वाकई सराहनीय है।

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