पौड़ी : उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के दूरदराज के गांवों में इन दिनों सुबह का वक्त कुछ अलग ही माहौल लेकर आता है। जंगल के रास्ते पर छोटे-छोटे बच्चे स्कूल बैग टांगे खड़े रहते हैं, लेकिन अब उनके साथ हरे रंग की वन विभाग की जीप भी होती है। दरअसल, भालू और गुलदार के लगातार दिखने की वजह से बच्चों की जान को खतरा बना हुआ था।
अब वन विभाग की टीम खुद बच्चों को घर से स्कूल तक छोड़ने और लेने का जिम्मा संभाल रही है। यह तस्वीर सिर्फ डांगी और थनूल गांव की नहीं, बल्कि पूरे कल्जीखाल विकासखंड की है, जहां जंगली जानवरों का आतंक पढ़ाई पर भारी पड़ रहा था।
एक भालू ने बदल दी पूरी दिनचर्या
कुछ दिन पहले डांगी गांव के तीन बच्चे सुबह-सुबह स्कूल के लिए निकले थे। रास्ते में अचानक एक मादा भालू अपने दो शावकों के साथ सामने आ गई। बच्चे घबरा कर चीखते-चिल्लाते गांव की ओर भागे। खबर मिलते ही ग्रामीण पटाखे और डंडे लेकर दौड़े और किसी तरह भालू को जंगल की तरफ खदेड़ दिया। इस घटना के बाद तो बच्चे डर गए ही, पूरे गांव में हड़कंप मच गया।
उसके बाद से कोई भी बच्चा अकेले जंगल के रास्ते स्कूल जाने को तैयार नहीं था। हाईस्कूल डांगी में सिर्फ छह बच्चे पढ़ते हैं – तीन डांगी से और तीन पास के थनूल गांव से। स्कूल गांव से करीब ढाई किलोमीटर दूर है और बीच में घना जंगल पड़ता है।
पहले पंचायत भवन बना अस्थायी स्कूल
जब बच्चे लगातार स्कूल आने बंद हो गए तो प्रधानाध्यापिका नीलम बिष्ट ने तुरंत कदम उठाया। अभिभावक-शिक्षक संघ की बैठक बुलाई गई और फैसला हुआ कि बोर्ड परीक्षाओं तक स्कूल को गांव के पंचायत भवन में ही चला दिया जाए। इस तरह बच्चों को जंगल के रास्ते जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। नीलम मैम बताती हैं कि सुरक्षा से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं है, लेकिन पढ़ाई भी नहीं रुकनी चाहिए। पंचायत भवन में क्लास चलने से बच्चों का मन लगा रहा और वे रोज आने लगे।
वन विभाग ने संभाला सुरक्षा का मोर्चा
स्थिति को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग की टीम अब रोज सुबह गांव पहुंचती है। बच्चे जीप में सवार होकर स्कूल जाते हैं और शाम को सुरक्षित घर लौटते हैं। स्थानीय कार्यकर्ता जगमोहन डांगी बताते हैं कि पिछले कई सालों से इलाके में गुलदार और भालू की संख्या बढ़ी है। खेतों के पास मवेशी और कुत्ते मारने की घटनाएं आम हो गई हैं। ऐसे में बच्चों का अकेले जाना नामुमकिन सा था। अब वन विभाग की यह पहल से अभिभावकों ने राहत की सांस ली है।
जिलाधिकारी ने भी लिया संज्ञान
पौड़ी की जिलाधिकारी डॉ. स्वाति एस भदौरिया ने पूरे मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने बताया कि जिले के कई गांवों में ऐसी ही समस्या है। जहां-जहां जंगली जानवरों की ज्यादा सक्रियता दिखी, वहां स्कूलों को अस्थायी रूप से सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट कर दिया गया है। साथ ही वन विभाग को दिन-रात गश्त बढ़ाने और ग्रामीणों को जागरूक करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई दोनों सुनिश्चित करना पहली प्राथमिकता है।
असल समस्या क्या है?
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष कोई नई बात नहीं है। राज्य वन विभाग की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच साल में गुलदार और भालू से जुड़ी घटनाओं में 40 प्रतिशत से ज्यादा का इजाफा हुआ है। जंगलों के कटने, खाने की तलाश और इंसानी बस्तियों के फैलने से जंगली जानवर गांवों की तरफ आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ सुरक्षा के इंतजाम ही काफी नहीं, बल्कि जंगल में पानी और चारे की व्यवस्था, कॉरिडोर सुरक्षित करना और ग्रामीणों को मुआवजा जल्दी देना भी जरूरी है। तब तक वन विभाग की जीप और पंचायत भवन जैसे अस्थायी समाधान ही बच्चों की मुस्कान बचा रहे हैं।







