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Goa Nightclub Fire : सिर्फ 22 साल का था मनीष… गोवा अग्निकांड में उत्तराखंड ने खोए 9 बेटे

By Rajat Sharma

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Goa Nightclub Fire : गोवा के एक नाइट क्लब में 6 दिसंबर की रात लगी भीषण आग ने कई जिंदगियां छीन लीं। इस हादसे में उत्तराखंड के मूल निवासी कुल नौ लोग अपनी जान गंवा बैठे। इनमें से पांच सीधे उत्तराखंड से थे, जबकि चार दिल्ली में रहकर काम करते थे। सबसे छोटी उम्र के शिकारों में चंपावत जिले के दूरदराज गांव नेत्र सलान के 22 साल के मनीष महर भी शामिल हैं।

मनीष अपने परिवार की उम्मीद थे। बेहतर जिंदगी की तलाश में वे कुछ महीने पहले ही गोवा गए थे और एक नाइट क्लब में नौकरी कर रहे थे। शनिवार की उस काली रात में अचानक लगी आग ने सब कुछ खत्म कर दिया। जब खबर गांव पहुंची तो पूरा इलाका सन्न रह गया।

सरकार के प्रयास से शव को एयरलिफ्ट कर गांव लाया गया

हादसे की जानकारी मिलते ही उत्तराखंड सरकार हरकत में आ गई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गोवा सरकार से तुरंत संपर्क किया। सोमवार देर शाम मनीष का पार्थिव शरीर विशेष विमान से गोवा से देहरादून और फिर सड़क मार्ग से चंपावत के नेत्र सलान गांव पहुंचाया गया। शव पहुंचते ही घर में चीख-पुकार मच गई। मां-बाप, बहनें और पूरा परिवार बेसुध हो गया।

मंगलवार को गमगीन माहौल में हुआ अंतिम संस्कार

अगले दिन यानी मंगलवार को गांव के श्मशान घाट पर मनीष को अंतिम विदाई दी गई। पूरा गांव उमड़ पड़ा। चंपावत के जिलाधिकारी मनीष कुमार खुद अंतिम संस्कार में शामिल हुए। कई जनप्रतिनिधि और सैकड़ों ग्रामीण आंसुओं के साथ खड़े रहे। माहौल इतना भारी था कि कोई बोल नहीं पा रहा था।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने फोन पर परिजनों से बात की और गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि सरकार परिवार के साथ है और हर संभव हर मदद की जाएगी। जिलाधिकारी ने बताया कि गोवा सरकार भी जल्द ही मुआवजे की राशि देगी।

सिर्फ 22 साल की उम्र में टूट गए सारे सपने

गांव वालों का कहना है कि मनीष परिवार का इकलौता सहारा बनने की तैयारी कर रहा था। पिता की तबीयत ठीक नहीं रहती, इसलिए वह बाहर कमाने गया था। अच्छी कमाई हो रही थी और घर में खुशी लौटने की उम्मीद जगी थी। लेकिन एक पल में सब खत्म हो गया। आज घर में सिर्फ सन्नाटा और आंसू हैं।

यह हादसा एक बार फिर याद दिलाता है कि बाहर कमाने गए हमारे युवा कितनी मुश्किलों का सामना करते हैं। नाइट क्लब जैसे जगहों पर सुरक्षा के मानक कितने कमजोर हैं, यह भी सवाल उठ रहा है।

परिवार अभी भी सदमे में है। आस-पास के गांवों में भी मातम पसरा हुआ है। मनीष जैसे कई युवा रोज़ी-रोटी के लिए घर से दूर जाते हैं, लेकिन कभी-कभी वापस नहीं लौट पाते।

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