मरने वालों की अंतिम क्रिया को लेकर सरकार की ओर से कोई स्पष्ट गाइडलाइन नहीं

देहरादून। कोरोना संक्रमण से पीड़ित मरीजों की मौत के बाद उनके शव को भी लोगों की बेरुखी का शिकार होना पड़ रहा है। कहीं मरने वाले लोगों का दो से तीन तक अंतिम संस्कार नहीं हो पा रहा है, कहीं ये शव दफ्न होने के लिए दो गज जमीन के इंतजार में हैं। इधर, पुलिस-प्रशासन तू देख… मैं आता हूं की तर्ज पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालती दिख रही है। राज्य सरकार की ओर से मरने वाले लोगों की अंतिम क्रिया को लेकर कोई स्पष्ट गाइडलाइन न होने के चलते इस तरह की व्यावहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं।

कई मरीजों के अंतिम संस्कार के मामले में देखा गया है कि किस प्रकार प्रशासन हीं नहीं एक पूरा सामाजिक ताना-बाना कोरोना पॉजिटिव मरने वाले लोगों के शवों का मौन बहिष्कार कर रहा है। यह हाल तब है, जबकि तीर्थनगरी में अभी तक ऐसे कुल नौ मामले सामने आए हैं। भविष्य में अगर ये मामले बढ़े तो किस प्रकार की कार्ययोजना के अनुरूप इनसे निपटा जाएगा, यह अभी तय नहीं है।
कोविड-19 को लेकर सरकार की ओर से जारी एसओपी में यह स्पष्ट नहीं है कि किसी प्रकार से कोरोना पॉजिटिव मृत व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाएगा। ऐसे में संक्रमण के खतरे को देखते हुए पुलिस-प्रशासन ही नहीं, परिवार के लोग तक इनसे दूर भागते दिखाई दे रहे हैं। जबकि ऋषिकेश में पहले दो केस में अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया में कोतवाली पुलिस ने भूमिका निभाई। लेकिन अब अंदरखाने पुलिस में इस बात को लेकर चर्चा है कि हमारा काम कानून व्यवस्था को बनाए रखना है, दूसरी प्रक्रिया स्वास्थ्य विभाग और तहसील प्रशासन के अंतर्गत आती हैं।  कुुुछ केस हकीकत बयां कर रहे हैैं:

केस 1

घनसाली निवासी 56 वर्षीय कोरोना पॉजिटिव एक व्यक्ति की 11 जून को मौत हो गई थी। दो दिन बाद 13 जून की शाम को इनका अंतिम संस्कार हो पाया। पहले से विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त इस व्यक्ति को एक जून को एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां चिकित्सकों ने इन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए। …और 11 जून की सुबह इनकी मृत्यु हो गई।

 

केस 2

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश निवासी एक 25 वर्षीय युवती की भी 11 जून को मौत हो गई थी। लेकिन 13 जून की देर शाम तक उसका शव भी मोर्चरी में ही पड़ा था। कहा जा रहा है कि इनके परिजन अभी तक नहीं पहुंच पाए थे। उनसे लगातार संपर्क किया जा रहा है। यह युवती भी पहले से ही विभिन्न बीमारियों से ग्रसित थी। लेकिन मौत के साथ कोरोना जुड़ गया तो शव के पंचतत्व में विलीन होने में लगातार विलंब हो रहा था।

 

केस 3

ब्रेम हेमरेज के कारण एम्स में भर्ती हुई 58 वर्षीय लालकुंआ नैनीताल निवासी महिला की मौत एक मई को उपचार के दौरान हो गई थी। अब इनके अंतिम संस्कार की बारी आई तो घाट पर मौजूद दाह संस्कार प्रक्रिया को पूरा कराने वाले पंडितों और अन्य स्टाप ने अपने को कमरे में सिर्फ इसलिए बंद कर लिया, मरने वाली महिला कोरोना पॉजिटिव थी। इस केस में पुलिस की भूमिका सराहनीय रही। कोतवाली पुलिस ने खुद के खर्च पर इस महिला का अंतिम संस्कार कराया और अन्य औपचारिकाएं पूरी की।

 

केस 4

मुजफ्फरनगर निवासी 25 वर्षीय युवती की तीन जून और मुजफ्फरनगर के ही एक अन्य 26 वर्षीय युवक की चार जून को कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद मृत्यु हो गई थी। अगले दिन इनके शवों को कब्रिस्तान में दफनाने की बारी आई तो रानीपोखरी केे ग्रामीणों ने इसका बहिष्कार कर दिया। पूरे दिनभर हंगामा चलता रहा। आखिरकार देर शाम को प्रशासन ने इन दोनों शवों को एक को डोईवाला तो दूसरे को देहरादून में दफनाने का बंदोबस्त किया। इस मामले में प्रशासन की लापरवाही खुलकर सामने आई थी। जिसने ग्रामीणों को पहले विश्वास में नहीं लिया।

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