अंग्रेज अधिकारी भी नतमस्तक हुआ था कमरुनाग की अदृश्य शक्ति के आगे:-

टीम डिजिटल : कमरूनाग जी द्वापर युगीन देवता हैं। पांडवों के ठाकुर के रुप में पूज्य कमरुदेव जी मंडी जनपद के अराध्य देव हैं।मंडी और सुकेत रियासत के सबसे बड़े तीर्थ सरानाहुली को प्राचीनता की सीमा मे नहीं बांधा जा सकता।2006 से 2015 के मध्य तत्कालीन कमरुदेव कमेटी के कटवाल निर्मल ठाकुर के नेतृत्व में कमरुदेव परिसर का यादगार विकास हुआ।चैलचौक-मटोगलु-जवाल-झौर-खुंडा तथा चैलचौक-कुक्कड़ीगलु-बांदली-सरोआ-सजीहणी-सकरैणी-कलहणी-झोर-खुंडा होकर खुंडा से आगे कमरुदेव तक पैदल चलने योग्य पांच फुट चौड़े रास्ते के साथ रोहांडा और चौकी की ओर से भी कमरुदेव “ओडे” सेलगभग एक किलोमीटर इसी तरह के रास्ते प्राकृतिक आनंद को अत्याधिक आरामदेह बना देते हैं। कमरुदेव झील के चारों ओर के तट की विशाल दीवार मंदिर परिसर को चार चांद लगा देती है।प्रकृति के इस सुरम्य स्थल पर श्रद्धालुओं के रात्रि निवास के लिए पर्यावरण के अनुकूल सरायों के निर्माण व कमरुदेव जी के साधारण सा दिखने वाले भवन की पुरातात्विक शैली में निर्माण इस तीर्थ की ऐतिहासिकता को बल प्रदान करता है।पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक और महत्वपूर्ण सरानाहुली झील/सौर के पूर्वी तट पर विराजमान श्री कमरुदेव जी के देओरे में प्रतिष्ठापित कमरुदेव जी का साधारण सा श्रीविग्रह आज दर्शनीय होने के साथ विश्व प्रसिद्ध है।वसुदैव कुटुम्बकम का आदर्श स्थल बने इस तीर्थ पर हिन्दू ही नहीं सिख, मुस्लिम और इसाई भी अपने जीवन की समस्याओं के समाधान के साथ मानसिक शांति प्राप्त करते हैं।

यूं तो वर्ष पर्यन्त तक हर संक्रांति को लोग कमरुनाग आकर श्रद्धासुमन चढ़ाते ही हैं परंतु आषाढ़ की संक्रांति को इस स्थान पर लगने वाले सरानाहुली मेले में 40-50 हजार श्रद्धालु अद्वितीय सौंदर्य से परिपूर्ण इस स्थल पर पहुंचकर अपनी मन्नौतियां कमरुदेव के श्री विग्रह के आगे अर्पित करने के बाद झील में नाग रुप में विराजमान कमरुनाग जी को भी सोने-चांदी के आभूषण और नकदी “तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा” के भाव से अर्पित कर स्वयं को धन्य मानते हैं। अरबों रुपये की धन संपदा इस झील के गर्भ में संचित हुई है। संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा और कमरुदेव कमेटी के पूर्व कटवाल निर्मल सिंह ठाकुर का कहना है जिस प्रकार अरबों रुपये की धन-संपति कमरुनाग झील में अर्पित की जाती है,इसे देखकर 1911 में अंग्रेज अधिकारी गावर्ट ने इस विशिष्ट परंपरा को अनुचित मानकर उसने झील का पानी निकालने का निर्देश दिया तथा झील में मन्नौतियों के संकल्प के रुप में समर्पित सोने-चांदी के आभूषण और नकदी रुपये निकाल कर सरकारी कोष में जमा करवाने के निर्देश दिए।कहते हैं कि कमरुदेव के पुजारियों, कारदारों ने अंग्रेज अधिकारी को ऐसा करने से रोका। लेकिन अंग्रेज अधिकारी ने लोगों की इस धार्मिक मान्यता को अंधविश्वास कहकर अपनी आज्ञा को व्यवहारिकता प्रदान करने पर तुल गया। जैसे ही गावर्ट के निर्देशानुसार कमरुनाग झील में दबी धन-संपदा को निकालने का कार्य शुरू हुआ, अंग्रेज अधिकारी बीमार हो गया।बाद में अंग्रेज अधिकारी गावर्ट ने लोगों की बात मान ली तथा झील में छिपी हुई धन-संपदा को निकलवाने का कार्य बंद करवा दिया।सुख और कल्याण की भावना से से निहित परमानंद की अनुभूति प्राप्त कर गावर्ट कमरुदेव जी के आगे नतमस्तक होकर क्षमा याचना मांगने के बाद ब्रिटिश सेवा से त्यागपत्र देकर इंग्लैंड चला गया।कमरुदेव जी के ऐसे अनेकों चमत्कारों को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।ये चमत्कार आज भी यहां आने वाले हर श्रद्धालु के साथ उतने ही जुडे़ हैं जितने प्राचीन काल में।इस वर्ष कोरोना के विश्वव्यापीअनियंत्रित संक्रमण के करण कमरुनाग जी का वार्षिक उत्सव नहीं हुआ। आषाढ़ संक्रांति व “बकरयाला साजे” के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने अपने घरों में ही पूजा स्थल में कमरुदेव जी की प्रतिमा के आगे एक “परात’ में पानी भरकर सरानाहुली झील बनाकर इसमें पठावा (देवदार के परागकण) पुष्प, सिक्के अर्पित कर आटे से बनाए बकरे की बलि देकर विधिवत कमरुदेव जी पूजा अर्चना कर शुभ आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं को धन्य किया तथा कोरोना संग्रमण से विश्व मुक्ति की प्रार्थना की।

– डॉ जगदीश शर्मा
पांगणा करसोग
मण्डी हिमाचल प्रदेश

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