पितृ दिवस् पर पर विशेष :- पिता एक अदृश्य ब्रह्मांड

डिजिटल डेस्क : “पिता”, यह मात्र एक शब्द नहीं अपितु एक पुत्र की सभी संभावित शक्तियों को समेटे हुए एक अदृश्य ब्रह्मांड है। इस अदृश्य परिवेश में ही एक पुत्र स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। जब तक उसके सर पर पिता के रूप में वटवृक्ष रूपी छाँव है, वह इस संसार में किसी भी प्रकार की समस्या का एक अभूतपूर्व विश्वास के साथ सिर्फ सामना ही नहीं करता बल्कि उस समस्या को परास्त भी करता है। एक पिता का जीवन पर्यंत अपने पुत्र के लिए निस्वार्थ भाव से किया गया त्याग उस पुत्र के जीवन को ऐसे उच्चतम संस्कार रूपी आभूषणों से अलंकृत करता है कि वह नित नई ऊंचाइयों को छूता है।

जीवन के शुरुआती चरण में पुत्र की हठधर्मिता को एक पिता जिस प्रकार से संभालता है वह प्रशंसनीय है। उसी पुत्र के जीवन के मध्यम काल में वही पिता एक मित्र की भांति उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलता है और उसे जीवन की कठिनाइयों का कदाचित आभास भी नहीं होने देता। मेरे विचार में पिता का प्रेम अदृश्य होता है और पुत्र को उस अदृश्य प्रेम का आभास स्वयं पिता ही नहीं होने देता क्योंकि पुत्र की नजरों में पिता एक ठोस वट वृक्ष के समान हैं जो जीवन पर्यंत उसको अपनी छांव से ठंडक रूपी सुख प्रदान करता है। अगर यही ठोस वटवृक्ष माता के कोमल हृदय रूपी प्रेम को परिभाषित करने लगेगा तो पुत्र के पथ भ्रमित होने का डर बना रहेगा। बस यही एक कारण मुझे लगता है जो पिता को अपने प्रेम का एहसास एक पुत्र को कराने से रोकता है।

एक पुत्र तब तक अपने पिता का मूल्य नहीं समझता जब तक वह स्वयं एक पिता ना बन जाए। जब उसके हृदय में प्रेम रूपी सागर की लहरें हिलोरें मारती हैं और उसके मन में प्रेम रूपी त्याग की भावना का अकारण ही अवतरण होता है तब उसको अपने पिता के अदृश्य प्रेम का एहसास होता है और वही संस्कार वह अपने पुत्र को देकर उसका पथ प्रदर्शित करता है और उसके जीवन रूपी मार्ग को प्रशस्त करता है। पिता और पुत्र का यह रिश्ता एक अटूट बंधन है जिसमे दोनों ही एक दूसरे के लिए अपने अदृश्य प्रेम की भावनाओं को कभी व्यक्त नहीं करते। परंतु दोनो ही एक-दूसरे की समस्याओं के निराकरण को कोई कसर नही छोड़ते।

पिता के जीवन काल की अंतिम बेला पर पिता-पुत्र का विछोह एक असहनीय दुख प्रदान करता है जिसको शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। भविष्यकाल के उस विछोह रूपी क्षण के विचारमात्र से ही मेरा हृदय द्रवित हो उठता है क्योंकि पुत्र के जीवन के अंतिम चरण में वह वटवृक्ष अपनी सुख रुपी ठंडी छांव देने के लिए उपस्थित नहीं होता वरन वह पुत्र स्वयं ही उस वटवृक्ष की भूमिका को अपने जीवन मे आत्मसात कर लेता है और वंश दर वंश इस भूमिका को निभाने वाला चरित्र बदलता रहता है परंतु ये भूमिका अजर-अमर है, अविनाशी है, अमिट है।

– विभोर शर्मा
(देहरादून)

Leave A Reply

Your email address will not be published.