सच्ची घटनाओं पर आधारित लघुकथा : बरगद की छांव

टीम डिजिटल : उस वक़्त मैं तकरीबन आठ या दस साल का था।गांव में दशहरे के मौके पर रामलीला होता। रामलीला स्थल हमारे घर से क़रीब आधा किलोमीटर था,रास्ते में एक कुंए के पास बरगद का काफ़ी विशाल पेड़ है,जिसके तने इतने विशाल और मजबूत थे की पूरे कुंए को ढके रहते जिसे रात के वक़्त देख कर ही अजीब सा डर लगता है। सब गांव वाले कहते वहां भूत रहता है उस तरफ जाते वक़्त मत देखा करो मगर मैं ख़ुद को देखने से रोक नहीं पाता लेकिन अंदर ही अंदर डर भी काफ़ी लगता क्युकी वो पेड़ और कुंए का अंधेरा किसी को भी विचलित कर देने के लिए काफ़ी था मैं तो फिर भी तब बच्चा था। जाते वक़्त तो जैसे तैसे उस रास्ते से चले जाते लेकिन आते वक़्त रात के क़रीब 12 या 1 बज गए होते रामलीला ख़तम होते होते उस वक़्त का माहौल और भी डरावना होता। एक दिन मां बीमार हो गई,गांव के वैद्य जी ने उन्हें बरगद के पत्ते का काढ़ा बना कर पीने के लिए कहा। पिताजी उस वक़्त शहर में थे मरता क्या न करता वहां जानें के लिए मैं तैयार हुआ लेकिन समस्या ये की मेरे साथ कोई भी जाने के लिए तैयार नहीं था। मां के लिए मैंने हिम्मत जुटाई और हनुमान चालीसा पढ़ते पढ़ते बरगद के पास गया और उसके छोटी शिखायों से पत्ते तोड़ लाया।हाल ये था कि गिलहरियों के आने जाने से जब पत्तियां कांपती तो मैं अंदर तक कांप जाता। मगर उस दिन बरगद मेरे लिए वरदान साबित हुआ, मां एकदम स्वस्थ हो गई और मेरे इस साहस की वजह से गांव वालों का बरगद का भूत वहां से भाग गया जो था है नहीं कभी। अब अक्सर वट सावित्री पूजा के दिन लोग वहां पूजा करने जाते है और कुंए की अब अच्छे से मरम्मत कर दी गई है।एक छोटा सा मंदिर भी बना दिया गया है वहां। बच्चे अब अक्सर वहां कोई खेल खेलते मिल जाते हैं और राहगीर आते जाते आराम करते हैं।

– शिवम् मिश्रा “गोविंद”
मुंबई महाराष्ट्र

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