लघुकथा : एक हाथी की चिट्ठी

जब किसी आदमी की बीवी मर जाती हैं, तब उसे कितना दर्द महसूस होता है यह तो वो जानता है और उसकी आत्मा ही जानती है। आज वही दर्द एक शिद्दत से मैं महसूस कर रहा हूं। जब मेरी पत्नी मुझे छोड़ कर इस दुनिया से चली गई है, मुझे तब इतना दुःख न होता जब वह अपनी मौत मरती लेकिन उसे दूसरो की दी हुई खौफनाक, दर्दनाक मौत से बहुत मैं आहत हूं और अंदर से बिलकुल टूट चुका हूं, बिखर चुका हूं। सच पूछो, तो पूरी मनुष्य जात से नफरत हो गई है मुझे अब। आखिर क्या मिला मेरी बेगुनाह हथिनी और उसके पेट में पल रहे बच्चे को मार कर। आखिर क्या खता की थी मेरी हथिनी ने। चाहे नीचे वालो की अदालत में मुझे न्याय न मिले पर ऊपर वाले की अदलत में मुझे जरूर न्याय मिलेगा, पर आप लोगों से हाथ जोड़कर बस इतनी ही विनती है कि मेरी मर चुकी हथिनी पर राजनीति न करें। चाहे हमें न्याय दे या न दें। वैसे भी मुझे गंधाते राजनीति के तालाब से पैदा हुए सियासतदानों से ज्यादा उम्मीद नहीं है। मेरी पत्नी हथिनी की तरह फिर कोई राक्षस किसी बेजुबान जानवर को बारूद भरे अनानास, जहर या गोली से अपना शिकार न बना सके बस आप इतनी तरतीब करिए।

विनयवत
बारूद भरे अनानास से मरी हथिनी का बहुत दुःखी पति

 

लेखक-सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी यूपी
पिन-262701
मो-7376236066

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