सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर मचा घमासान : आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं !

डिजिटल डेस्क : जैसा कि हम सब जानते हैं आरक्षण के प्रावधान का इतिहास लगभग ७० साल पुराना रहा है। सन् १९४२ में डॉ भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों की उन्नति के समर्थन हेतु भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की । उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में दलित वर्ग के लिए आरक्षण की मांग रखी । जब सन् १९४७ में भारत को स्वतंत्रता मिली तब डॉ भीमराव अंबेडकर को भारतीय संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया । भारतीय संविधान धर्म, जाति, लिंग, नस्ल व जन्म के स्थान के आधार पर किसी भी भेदभाव का निषेध करता है। वह सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए संविधान में विशेष प्रावधान पारित करती है। आगामी १० सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जाति और जनजातियों को अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किया गया। बाद में राजनीतिक दृष्टिकोणों के मद्देनजर इस आरक्षण नीति में अनेकों सुधार भी किए गए और इसके निर्धारित समय में भी बदलाव करते हुए इसे आज तक चलाया जा रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला ‘आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं ‘ सुनाया गया जिस जोर-शोर से हो-हल्ला मचा हुआ है । इस फैसले के विरोध और समर्थन दोनों पक्षों के बुद्धिजीवियों में आपसी कवायद ट्विटर ट्रेंड के हेड लिस्ट में शामिल हो चुकीं हैं । आरक्षण के समर्थन और विरोध में अनेक तर्क-वितर्क भी देखने को मिल रहे हैं । एक पक्ष के दिए गए तर्क का दूसरे पक्षों द्वारा खंडन किया जा रहा है बाकी अन्य इन दोनों के बीच मूक दर्शक बन इनके तर्क-वितर्क का अवलोकन करने में लगे हैं ताकि कोई बीच का मार्ग प्रशस्त किया जा सके । मगर इस पर ध्यान कोई नहीं देना चाहता कि सुप्रीम कोर्ट ने इतना बड़ा ऐतिहासिक फैसला क्यों दिया होगा ? यह फैसला जो कि ऐतिहासिक है बिना विचार मंथन के सुप्रीम कोर्ट तो सुनाएगी नहीं ! अनेकों बुद्धिजीवियों ने इस पर अपना मत रखा होगा इसे पूरी तरह से समझा होगा आपसी विचार मंथन किया होगा तब कहीं जाकर यह निर्णय निकला होगा जिसे आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए मुहर लगाया होगा । जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आरक्षण का प्रावधान महज कुछ समय के लिए संविधान में पारित किया गया था ताकि पिछड़े व दलित वर्ग के लोगों को भी समानता की श्रेणी में लाया जा सके । प्रश्न यह उठता है कि आज ७० साल हो गए इस आरक्षण को लागू हुए क्या अभी भी इस आरक्षण की जरूरत है ? जबकि हम चाँद तक का सफर तय कर रहे हैं और विश्व गुरू बनने की होड़ में लगे हुए हैं । सच कहें तो भारत में आरक्षण एक राजनीतिक आवश्यकता है जो मतदान के विशाल दलित वर्ग समूह का लाभ लेना चाहते हैं । सभी राजनैतिक दल इसके पूर्ण समर्थक हैं नहीं तो कुछ सालों का प्रावधान आज तक आखिर कैसे जारी रहा ? जैसा कि हम जानते हैं आरक्षण महज एक समानता का अधिकार है न कि मौलिक अधिकार बिना जाने समझे इस पर तर्क-वितर्क अमाननीय है क्योंकि ६ मौलिक अधिकारों में आरक्षण का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता अतः मौलिक अधिकारों में आरक्षण की कवायद बेबुनियादी है । माननीय सुप्रीम कोर्ट व सहयोगियों का मानना है कि आरक्षण और विकास दोनों साथ-साथ कभी नहीं चल सकते इसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि आरक्षण का मौलिक अधिकारों में स्थान बिल्कुल नहीं है । आरक्षण जातिवाद को बढ़ावा देने में सहायक हो रहा है इससे आपसी भेदभाव को भी बढ़ावा मिल रहा है । एक वर्ग को दूसरे वर्ग को लड़ता और तोड़ता है अतः यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि आरक्षण बेबुनियाद है ।
आरक्षण विकास में बाधक का कार्य कर रहा है अगर देश के विकास में सहभागिता दिखाना चाहते हैं तो हमें एक जुट होकर आरक्षण को त्यागना होगा क्योंकि आरक्षण विकास का दुश्मन है । अब समय बदल चुका है हर देश एक दूसरे से विकासीय होड़ लगाने में लगे हैं और हम यहाँ आरक्षण के मुद्दे पर हो-हल्ला करने में लगे हैं । सुप्रीम कोर्ट यानी भारत का सर्वोच्च न्यायालय का यह ऐतिहासिक फैसला बिना कारण तो नहीं आया होगा तमाम साक्ष्यों और विचारों पर गहन मंथन स्वरूप ही यह संभव हुआ होगा ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का विरोध करना अमाननीय है हमें उसके फैसले का स्वागत करते हुए देश के विकास में सहभागिता दिखानी चाहिए क्योंकि कि हम खुद को वर्गों में रखने से पहले एक भारतीय हैं और भारत के हित में सहयोग हमारा प्रथम अधिकार बनता है ।

रचनाकार :- मिथलेश सिंह ‘मिलिंद’
मरहट पवई आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)
९६८२४७२२७०
mith3032@gmail.com

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