धर्म संस्कृति : जीवित सदसद्विवेकी, ज्ञानी पुरुषों की पूजा, श्रद्धा पूर्वक सत्कार ही श्राद्ध
धर्म संस्कृति : जीवित सदसद्विवेकी, ज्ञानी पुरुषों की पूजा, श्रद्धा पूर्वक सत्कार ही श्राद्ध

गृहस्थ आश्रम में मनुष्य को कई ऐसे कार्य करने पड़ते हैं, जिनसे मनुष्य को दोष लगते रहते हैं। जिनमें पांच मुख्य हैं- नित्य चूल्हा के जलने से ईंधन व पृथ्वी के अनेक जन्तु जलते, चक्की पीसने अथवा पिसवाने से अनेक जन्तु अन्न के साथ पिस जाते, मार्जनी (झाडू) द्वारा अनेक कोमल छोटे जन्तु मरते, ऊखली-मूसल से कूटने से अनेक जीव मरते और जलपात्र- घड़े आदि के रखने के स्थल पर उनके नीचे शीतल प्रदेश की चाह में अनेक जीव आकर ठहरते हैं और घड़ादि के ढुरने से मारे जाते हैं। ये ऐसे आवश्यक कार्य हैं, जिन्हें गृहस्थों को करने ही पड़ते हैं। और जब करने पड़ते हैं, तो जीव-जन्तुओं के प्रत्येक पदार्थ में रहने से हानि या हिंसा भी होती है। इसी कारण गृहस्थों को दोष भी लगते हैं। इसलिए उस दोष के निवारणार्थ गृहस्थों को कुछ पुण्यकर्म भी नियमपूर्वक करने का विधान किया गया है। ऐसे पुण्यरूप कर्म को प्रायश्चित्त भी कहा जा सकता है, क्योंकि ईश्वर की सृष्टि में किसी का कुछ अपकार हो जाने पर उसको उसके बदले में प्रत्युपकार भी करना चाहिए। इसीलिए भारतीय संस्कृति में वेद का आश्रय लेकर पञ्च महायज्ञों – ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, अग्निहोत्र, वैश्वदेव और अतिथिपूजन की व्यवस्था करते हुए इन पञ्च यज्ञों को गृहस्थ जनों के द्वारा प्रतिदिन करने की व्यवस्था की गई है। मनुस्मृति तृतीयाध्यायादि में पञ्च महायज्ञों का प्रयोजन सहित व्याख्या करते हुए मनु महाराज ने कहा है कि अध्यापन अर्थात पढ़ाने का नाम ब्रह्मयज्ञ है। पढ़ाने के अन्तर्गत पढ़ना भी आ जाता है, क्योंकि पढ़ना होने पर ही पढ़ाना बन सकता है। और पढ़ने के अन्तर्गत सन्ध्याकर्म भी आ जाता है, क्योंकि सन्ध्या में गायत्री का पढ़ना ही मुख्य कर्म है। इसीलिये सन्ध्या के प्रसंग में मनुस्मृति में लिखा है कि- एकान्त वन आदि में जाकर सावित्री को पढ़ें। मनुस्मृति के इस कथन से स्पष्ट है कि स्वाध्याय का नाम ब्रह्मयज्ञ ठीक है, क्योंकि नित्य नियम से जिस-जिस वेद भाग का पढ़ना-पढ़ाना अथवा जप-पाठ आदि करना हो, वह सब स्वाध्याय तथा ब्रह्मयज्ञ कहाता है। द्वितीय तर्पण नामक पितृयज्ञ है। उसी का अवान्तर भेद श्राद्ध है। अग्निहोत्र- देवयज्ञ कहाता है, वैश्वदेव- भूतयज्ञ और अतिथिपूजन- नृयज्ञ कहाता है।

यज्ञ शब्द के अनेक अर्थ हैं। वेद सम्बन्धिनी विद्या अर्थात परमेश्वर की प्राप्ति जिस विद्या द्वारा की जाती है, वह ब्रह्मयज्ञ है। सदसद्विवेकी, ज्ञानी पुरुषों की पूजा, सत्कार जिसके द्वारा किया जाय, वह पितृयज्ञ है। जिसके द्वारा सर्वोत्तम गुण सबके लिए पहुंचाया जाय, वह देवयज्ञ अथवा परमेश्वर की आज्ञा पालन द्वारा देव नाम परमात्मा का पूजन जिससे किया जाय वह अग्निहोत्र देवयज्ञ है। पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि जन्तुओं का सत्कार जिस द्वारा किया जाय, वह भूतयज्ञ, बलिवैश्वदेव कहाता है। और उपदेशादि द्वारा सबको ठीक मार्ग पर चलाने वाले अकस्मात उपस्थित हुए अर्थात भोजन के समय आये मनुष्यों का सत्कार जिससे किया जाता है, वह नृयज्ञ कहाता है। ये पञ्च महायज्ञों के नामार्थ वा शब्दसम्बन्धी अर्थ हैं। जिस किसी प्रकार अन्य प्राणियों को सुख पहुँचाना धर्म कहाता है। इसी अर्थ से पञ्च महायज्ञ भी धर्म का संचय कराने वाले होने से धर्म शब्द के अर्थ हो सकते हैं। और जब ये धर्म हैं तो अधर्म की निवृत्ति भी किसी प्रकार हो सकती है। यद्यपि पञ्च महायज्ञ औषधि से रोग की निवृत्ति होने के समान चूल्हादि से होने वाले हिंसारूप दोषों के निवर्त्तक होने सम्भव नहीं, तथापि हिंसा रूप दोष से होने वाले अपराध का प्रतिपक्षी- विरोधी पञ्च महायज्ञ से होने वाला पुण्य फल हो सकता है। अर्थात जीवहिंसा का दुःख फल है और पञ्च महायज्ञों के अनुष्ठान का सुख फल होगा। सुख से दुःख की निवृत्ति होती ही है। तथा जैसे बुरे कर्म का फल दुःख मिलता है, वैसे अच्छे कर्म का सुख फल हो। अथवा जैसे भूख-प्यास से होने वाले दुःख की निवृत्ति अन्न-जलादि से होती है, तब सुख उत्पन्न हो जाता है। यह भी एक प्रकार का प्रायश्चित्त है, अर्थात वैसे ही पञ्च महायज्ञ के सेवन से पुण्य फल का उदय होकर दुःख का नाश होता है। जैसे दुःख भोगने से शरीर, इन्द्रिय, आत्मा और अन्तःकरण व्याकुल वा निर्बल हो जाते हैं, वैसे ही सुख मिलने पर हृष्ट-पुष्ट हो जाते हैं, यह भी एक प्रकार से दुःख-निवृत्ति का उपाय है। इस प्रकार पञ्च महायज्ञ अथवा सब सुकृत- पुण्य कर्म दुःख को हटाने वाले हो सकते हैं। जैसे अनेक अन्न-जलादि सुख के साधनों के उपार्जनरूप प्रयत्न वा उपाय दुःख हटाने के लिये ही प्रतिदिन मनुष्य करता है। वैसे ही पञ्च महायज्ञ भी प्रतिदिन सेवन करने योग्य हैं। जैसे- ब्रह्मचर्य के सेवन से मानस, वाचिक दुष्कर्म से होने वाले दुःख की वासनारूप जड़ पहले ही कट जाती है। पीछे उन, जिनका फल होना निश्चित नहीं जो औषधि करने से रोग के समान साध्य हैं।  ऐसे ही, संचित कर्मों का नाश हो जाने से दुःख भी उत्पन्न नहीं होता। तथा पितृनामक ज्ञानियों के सेवन करने से ज्ञानी लोग अनियतविपाक संचित दुष्ट कर्मों की निवृत्ति का उपाय दिखाते हैं। आगे होने वाले आचरणों को उपदेश से सुधार देते हैं, उससे दुष्ट कर्म नहीं करता, जिनका फल दुःख हो। इस प्रकार अन्य भी महायज्ञ दुःख के हटाने में हेतु हैं। गृहस्थ पुरुष को उचित है कि आलस्य, निद्रा और प्रमादादि को छोड़कर उनका सेवन करे। यह संक्षेप से सामान्य पञ्चयज्ञों का विचार है।

पितृयज्ञ के दो भेद हैं- तर्पण और श्राद्ध। उनमें तर्पण सामान्य तौर पर भूख-प्यास आदि से होने वाले दुःख की निवृत्तिरूप तृप्ति अथवा प्रसन्नता, मन में पूरा सन्तोष अथवा आनन्दरूप माना जाता है। और श्राद्ध नाम कर्मविशेष का है कि जिस कर्म के द्वारा अन्न से तृप्त हुए जन क्षुधा से होने वाले दुःख से निवृत्त होते हैं। श्रद्धा से जिस कारण दिया जाता है, इसलिये इस पितृसम्बन्धी दानकर्म को श्राद्ध कहते हैं। अथवा श्रद्धा पूर्वक दिये जाने वाले अन्न का नाम ही श्राद्ध है। इसी अर्थ से श्राद्धभोजी शब्द सार्थक बन जाता है कि श्राद्ध-नाम श्रद्धापूर्वक बनाये अन्न का खाने वाला। तथा इसी विचार के अनुसार पाणिनीय सूत्र श्राद्धमनेन भुक्तमिनिठनौ- सत्य सिद्ध होता है कि जिसने श्राद्ध का भोजन किया हो, वह श्राद्धी वा श्राद्धिक कहावेगा। यहां भक्ति श्रद्धा से पकाये हुए अन्न का नाम श्राद्ध है। इसी प्रमाण से श्राद्ध शब्द भोजन से होने वाले सत्काररूप कर्म का नाम है, यह निश्चित होता है। अन्यत्र भी वैदिक ग्रन्थों व आर्ष पुस्तकों में जहां-जहां श्राद्ध शब्द की व्याख्या अंकित है, वहां भी भोजन का ही प्रकरण है। लौकिक परिपाटी से भी भोजन सम्बन्धी सत्कार कर्म में श्राद्ध शब्द प्राप्त होता है। अनेक मनुष्य किसी नियत दिन जब किन्हीं ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, तब कहते हैं कि आज हमारे घर में श्राद्ध है। किन्तु वे लोग भी ऐसा करते समय पिण्ड आदि नहीं करते, केवल भोजन कराने का नाम भी श्राद्ध बोलते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि भोजन से होने वाले सत्कार कर्म और उस सत्कार के लिये श्रद्धा से बनाये अन्न का नाम श्राद्ध है, यही सत्य सिद्धान्त है। मनुस्मृति में पितृयज्ञ को तर्पण कहा गया है-

पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।-मनुस्मृति 3/70 । अर्थात- पितृयज्ञ को तर्पण कहते है।

मनु के इस श्लोक में मृत पितरो की गंध नहीं है। इस श्लोक का भाष्य करते हुए कुल्लूक भट्ट लिखते हैं:- अन्नाद्येनोदकेन वा इति तपणं वक्ष्यति स पितृयज्ञः। अर्थात तर्पण में अन्न पानी देने का विधान आगे कहेगे। यही पितृयज्ञ हैं। कहा गया है- 

कुर्यादहरहः श्राद्धमत्राद्येनोदकेन वा ।

पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्।।

अर्थात -पितरों को प्रीतिपूर्वक बुलाकर खना, पानी, दूध, मूल फल से प्रति दिन श्राद्ध करे।

इसमें श्लोक में मृत पितरो को रोज बुलाने का विधान कहीं भी नहीं है। तर्पण और श्राद्ध, दोनों में एक ही बात है- प्रबन्ध करना । वैदिक शब्द अन्नद्य भी इसी अर्थ प्रयुक्त हुआ है। मरे हुए पितरों को प्रीतिपूर्वक बुलाने का कुछ भी अर्थ नहीं। मृत आ ही कैसे सकते है? वैदिक सिद्धान्तानुसार तो उनका दूसरा जन्म हो जाता है और जो पुनर्जन्म को नही मानते वह भी मृत आत्मा की कुछ न कुछ गति तो मानते ही है। उनके अनुसार भी में भी मृतकों का बुलाना असम्भव है। वैदिक सिद्धान्त के अनुसार भस्मान्त शरीरम्। -यजुर्वेद 40।15 अर्थात मरने पर लाश को जला देना चाहिए। मनुस्मृति 2/16 से भी ऐसा ही कहा गया है। पांच भौतिक शरीर को बिना सडे गले अपने कारण में लय कराने की इससे उत्तम अन्य कोई विधि नही है। और फिर जलाने के बाद किसी के आने की कोई उम्मीद ही नहीं है। कर्म फल के सिद्धांत के अनुसार मृत्यु के कुछ काल पश्चात मृतात्मा के अन्य शरीर में उत्पन्न हो जाने के बाद पूर्व शरीर में आने की तो और भी कोई उम्मीद नहीं । आते तो सिर्फ जीवित ही हैं, जिनका श्रद्धा पूर्वक अन्न- जल से सत्कार ही उत्तम श्राद्ध व तर्पण है।

अशोक “प्रवृद्ध”

करमटोली , गुमला नगर पञ्चायत ,गुमला

पत्रालय व जिला – गुमला (झारखण्ड)

८३५२०७

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