वर्तमान परिस्थिति पर पढ़े कविता “मनोस्थिति”

मनोस्थिति

आज बड़ी विचित्र सी परिस्थिति है, 

जीवन मे आजादी की अनुपस्थिति है, 

धैर्य दे रहा है अब तो जवाब, 

मस्तिष्क मे उलझनों की उपस्थिति है।। 

 

समय हाथ से रेत की तरह जा रहा है, 

इंसान अपने जीवन को लक्ष्यविहीन पा रहा है, 

जो कल तक भविष्य को सँवारने की बात करता था, 

उसको तो अपना वर्तमान भी ना भा रहा है।। 

 

लगता है ईश्वर नाराज हो चला है, 

तभी तो धरती पर छोड़ी ये बला है, 

अहंकार मे दंभ जो भरता था मनुष्य, 

उसका अस्तित्व ही खतरे मे हो चला है।। 

 

इस महामारी ने जीवन को नया मोड़ दिया है, 

अपनो ने अपनो को ही पीछे छोड़ दिया है, 

मनुष्य के व्यवहार मे ऐसा परिवर्तन आया है, 

जिसने सभी भावनाओं को तोड़-मरोड़ दिया है।। 

 

कब वो दिन लौट के आएंगे? 

जब सभी एक दूजे को गले लगाएंगे, 

कब फिर से होंगी चारो ओर खुशियाँ? 

कब हम फिर से जी पाएंगे? 

 

प्रभु तुम पर विश्वास अटल है, 

भक्ति की धारा बहती अविरल है, 

इस महामारी से भी पार पाएंगे, 

अगर तुम्हारा साथ सचल है।।

 

– विभोर शर्मा (देहरादून)

#8126625142

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