मकर संक्राति पर आयोजित रामकथा का हुआ सजल विराम

मकर संक्राति पर आयोजित रामकथा का हुआ सजल विराम 

टीम डिजिटल। माघ मकरगत रबि जब होइ। तिरथपतिहि आव सब कोइ।। प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहि मुनि बृंदा।।  इन दो बीज पंक्तियों से प्रवाहित हुई रामकथा के आज विराम दिन पर उपसंहारक बातें करते हूए सीताजी के मुखसे निकला ये मंत्र का सजल संवाद करते हूए मोरारी बापू ने बताया कि सभी घाट पर कथा विराम ले रही है और गोस्वामी जी तुलसीदास जी ने अपनी कथा को विराम देते हुए सीता जी के पुनः वनगमन आदि कथा को छुआ नहीं क्योंकि गोस्वामी जी विवाद, प्रतिवाद,अपवाद और दुर्वाद से दूर रखते हैं।

इससे कुछ फलित नहीं होता, सिर्फ मानसिकता बिगड़ सकती है। वाल्मीकि सुंदरकांड का एक प्रसंग है: सीता जी के अग्नि प्रवेश की कथा है। शास्त्र गुरुमुख से होना चाहिए तो ही समझ में आता है।।बापू ने कहा कि मैं मनोरथ कर चुका हूं वाल्मीकि रामायण के कुछ प्रसंग गुरुमुख से संवाद करें,सीधे पढ़ लोगे तो अच्छा नहीं लगेगा। मानस के महत्व के पात्रों पर निष्ठा कम होगी। कथा तो सब गा सकते हैं। यहां शुक ने भी गाया,सूत ने भी गाया,बालक, नारी,पुरुष,नपुंसक,किन्नर,गंधर्व सुर,असुर,बंदर भालू सब गा सकते हैं।।फिर भी गुरु मुख से सुनने से संवाद स्थापित होगा।  गोस्वामी जी ने यह विवादित प्रसंग दूर किया सिर्फ इतना ही लिखा है:कहे कछुक दुर्बाता सीता अग्नि प्रवेश पर लिखा।

वाल्मीकि ने इस बात पर विस्तार हुआ है। राम कितना बोले हैं कि हमें लगता है कहां गया वो लोकाभिरामं? कहां गए हो राजीवलोचन राम? इसलिए वाल्मीकि रामायण सिर्फ पढ़ ले और गुरुमुख से ही सुने।। राम बहुत बोले।लक्ष्मण को अच्छा नहीं लगा।राम का आदेश हुआ सीता को लाओ।। सीता तैयार होकर अग्नि प्रवेश के लिए आई तब सभी को याद करती है। सबसे पहले आदित्य सूर्यदेव को याद किया और दश लोगों को याद किया।।वेद का यह मंत्र जहां ञुषि कहता है हे आदित्य!आपका सबसे ऊंचा स्थान है,यज्ञ में आप प्रथम प्रतिष्ठित है और उदित होते ही व्यापकता से सबको भर देते हैं। न्याय किस से मांगना चाहिए? सबसे ऊंचा हो,सत्कर्म रूपी यज्ञ जिनकी प्रतिष्ठा है और असीम आकाश में जो छा जाता है।। इतना प्रभाव हो वहीं हम फरियाद कर सकते हैं।

ऐसा कोई ना मिले सद्गुरु तो ग्रंथ के रूप में भी वो हाजिर है,वहां फरियाद करें।।आदित्य को पहले याद करती है दो कारण हैं:एक आप मेरे ससुर है, प्रथम है,लौकिक ससुर दशरथ सूरधाम में है। बाद में वह चंद्र को याद करती है क्योंकि राम जी के नाम के पीछे चंद्र है।  अग्नि को याद करती है।राम अग्नि से प्रकट हुए हैं।जैसे कहती है मेरी और कोई गति नहीं मैं अग्नि में जाउं या धरती में समा जाऊं! कहां जाऊं फिर वायु को याद करती है। हे पवन देव! आप तो मेरी निष्कलंकता के साक्षी है या ना है आपका बेटा तो साक्षी है। सूर्य चंद्र वायु और मुझे आकाश मार्ग से रावण ले गया,आकाश मेरी पवित्रता का साक्षी है। मुझे मालूम नहीं रावण किस दिशा में ले जा रहा है लेकिन दिशायें साक्षी है।वाल्मीकि में वह स्पष्ट प्रहार है।। राघवेंद्र! मैं परवश थी कहां बैठाई गई लेकिन मेरा मन कहीं बैठा है कि नहीं आप अंतर्यामी है आप ही देख लेना! जैसे मेरे राम आप सीता जी के तुलना में नहीं आ सकते।

रात और दिवस को याद किया।।कोई मेरी पवित्रता का साक्षी हो ना हो रात और दिन मेरी पवित्रता के साक्षी है।।मां जानकी ने पहले आदित्य को याद किया।।तुलसी जी सिर्फ दो शब्द ही लिखते हैं फिर सीता का अग्नि प्रवेश जो तुलसी जी ने नहीं उठाया।दूसरी बार का वनगमन भी नहीं बताया।।बापू ने कहा कि हम मिठाई या गुड़ खाते हैं तो चीटियां को हटा लेते हैं,गुरु विकारों और विवादों की चिट्टियां हटा कर देता है। इसलिए गुरुमुख जरूरी है।।मुझे सबसे ज्यादा खुशी है कि मैं गुरुमुख गा रहा हूं।। राम जैसा अन्य कोई पुरुष नहीं आंखों से सुनना पड़ेगा और गुरुमुख से यह स्थापित करना पड़ेगा।

रघुवंश के वारिस का नाम बताकर तुलसी जी ने कथा विराम किया।। गरूड और भुसुंडि का संवाद है। अति अनुराग प्रगट होता है तब कपट छूट जाता है।। उल्टा सूत्र भी सही है जब कपट छूट जाता है तो अति अनुराग प्रगट होता है।। आखिर में गरुड़ ने सात प्रश्न पूछे हैं और यह सात प्रश्न रामचरितमानस का सार है।।बापू ने कहा कि आगे महाराष्ट्र में मानस अभंग पर कथा करनी है।। और एक मनोरथ यह भी है मानस रामायण गांउं क्योंकि वाल्मीकि के प्रसंगों में बहुत भ्रांति है वह छूट जाए। सात प्रश्न है: सबसे बड़ा सुख क्या है? सबसे बड़ा दुख क्या है? सबसे बड़ा पाप कौन सा? सबसे बड़ा पुण्य कौन सा? सबसे मूल्यवान शरीर कौन और मानस भवरोग की चर्चा।। मनुष्य के शरीर के सिवा मूल्यवान कोई शरीर नहीं।  हम कर्मों से तो मनुष्य होने के लायक नहीं मगर करुणा से हमें मनुष्य का शरीर मिला है।। दारिद्रय के समान बड़ा दुख नहीं।संत मिलन समान कोई सुख नहीं। परनिंदा सबसे बड़ा पाप और सबसे बड़ा पुण्य है अहिंसा।

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा।
पर निंदा सम अघ न गरिसा।।

अरे खुद के शरीर की भी निंदा नहीं करनी चाहिए। मानसिक रोग का एकमात्र वैध सद्गुरु है और ऐसी सतपंच चौपाई का मतलब है सात चौपाई। एक चौपाई के चार चरण का बंधारण तो 14  पंक्ति यदि उर धरें तो जैसे वाल्मीकि के 14 स्थान प्रभु राम के निवास है वो दारुण अयोध्या से प्रकट होने वाले विदाई करेंगे।

मोरारी बापू ने प्रसन्नता से कथा को विराम देते हुए इन कथा का सुकृत सूफल वृंदावनस्थ रमाभैया और चित्रकूटस्थ शुभोदय बाजोरिया की चेतनाओं के हाथों से भगवान अय्यप्पा को समर्पित करते हुए कथा को विराम दिया। 
अगली-911वीं रामकथा 21 से 29 जनवरी के दरमियान देहूं गॉंव(महाराष्ट्र)से मानस अभंग पर गान होगा जो नियमित समय पर आस्था टीवी चेनल और चित्रकूटधाम तलगाजरडा यु-ट्युब पर जिवंत प्रसारित होगी।

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