कविता : योग

परंपरा का आधार
ऊर्जा शक्ति अपार।

पाते स्वास्थ लाभ
करते योगाभ्यास

तन का आधार
रोग मुक्त का द्वार

एकाग्रचित मन
शुद्ध तन निर्मल ।

जीवन है अनमोल
दे दो कुछ पल।

दे आत्म शुद्धि
इससे बढे बुद्धि ।

चंचल मन बस में रहे
पास न आवे कुबुद्धि।

पौराणिक पर गुणी है
रोगो की यह औषधि है ।

लेना देना कुछ नही
खर्च कोई लगता नही।

कई आसन है करने
समय थोडा ही लगते ।

अपनाओ जीवन में सभी
रहो चंगे लगो प्यारे।

– आशुतोष
पटना बिहार

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