कविता : चिंगारियां

अंजान सी चिंगारियां हुई थीं प्रस्फुटित
पा तपन तेजमयी हौले से करने लगीं बढत
निश्चल निस्वार्थ निर्मम और निष्कपट
अनवरत किरणों में हुईं थीं विभक्त
गतिशील सी गन्तव्य तक थीं सख्त
नव उमंग सूर्य संग ले चलतीं थीं मस्त
वारिस की वेदनाओं से हुई थीं स्तब्ध
वो चिंगारियां ज्वालामुखी बनने हुई थीं उद्धृत

– कविता आरजी चाहर
आगरा (यूपी)

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