गंगा अवतरण के पावन पर्व पर कविता : गंगा दशहरा

हर-हर गंगें! विमल तरंगे!
ब्रह्म कमण्डल से निकलीं,
फिर आयीं शम्भु जटाओ में।
रही झूलती और इठलाती,
धूसर शम्भु जटाओं में।
हर-हर गंगें!विमल तरंगे!

भागीरथ की विनती सुनकर,
शंकर ने दृग खोले।
एक धार छोटी सी छोड़ी,
कण-कण,तृण-तृण डोले।
हर-हर गंगें!धवल तरंगे!

चलता जाता आगे-आगे,
रथ भागीरथ जी का।
पीछे-पीछे बनता जाता’
पथ भी गंगा जी का।
हर-हर गंगें!विमल तरंगे!

शत्-शत् वन्दन-अभिनन्दन है,
इस पावन अवतरण दिवस पर।
कृपा कोर कर दो हे गंगे!
हर अनाथ पर दीन-विवश पर,
हर-हर गंगे! विमल तरंगे!

प्रवीणा दीक्षित
जनपद कासगंज

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