कविता : नहीं समय गृहिणी के पास

आज समय ही समय है सबके पास
काम नहीं कुछ किसी के हाथ,
समय काटे कैसे, यह सोचनीय
फिर भी नहीं समय गृहिणी के पास।
इतवार तो था नहीं कभी जीवन में
आज भी उसे आराम मिला नहीं,
कोई आमदनी वह कर नहीं सकती
फिर भी किसी से करती गिला नहीं।
उसकी छुट्टी तो कभी नहीं होती
हो जाए सुबह से लेकर रात,
चेहरे पर उसके शिकन न होती
घर के कामों में ही लगे होते हाथ।
न होटल, न रेस्टोरेंट खुले हैं
न बाहर से कुछ मंगवा सकते,
ऐसे में इन गृहिणियों के साथ
कम से कम हाथ ही बंटा सकते।
जिम्मेदारी उनकी आज और बढ़ी है
एक पैर पर अपने वो खड़ी है,
दिन – रात एक करके, घर संभाले
अधिकारों के लिए अपने कभी नहीं लड़ी है।
कृतज्ञता प्रकट करनी है इनकी
नमन करना बनता है हमारा,
युद्ध के मैदान में न सही ये
घर रूपी मैदान में हरदम अड़ी है।

– नीलू गुप्ता
सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

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