उत्तराखंड विशेष : नए जिले बनाने के संकेत पर टिकी उम्मीदें?
उत्तराखंड विशेष : नए जिले बनाने के संकेत पर टिकी उम्मीदें?

डिजिटल डेस्क : पर्वतीय क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थिति होने के कारण विकास की गति अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाती। उत्तराखंड राज्य का भी यही हाल रहा। जिस परिप्रेक्ष्य को लेकर राज्य बनाया गया था वह आज तक यहां की राजनीति के भंवर में फंसा हुआ है। विकास कागजों और घोषणाओं में खूब होता आया है। इतना जरूर है कि कुछेक प्रतिशत धरातल पर भी होता रहा। जिस पर बार-बार सवाल भी खड़े होते रहे हैं। असली विकास हुआ उनका जिनके हाथों सत्ता आती रही।

बात विकास की चल रही है तो पहाड़ में जब तक छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयां नहीं होंगी तब तक वास्तविक विकास वहां तक पहुंचेगा ही नहीं। इसके लिए छोटे जिलों व विकास खंडों के गठन की आवशयकता होती है। पहाड़ों में कई गांव जिला मुख्यालयों व विकास खंडों से इतने सुदूर और दुर्गम जगहों पर हैं कि जाने के लिए ही एक दिन पूरा खपाना पड़ता है। जिससे ग्रामीणों की समस्याओं का निदान सही ढंग से नहीं हो पाता व बार-बार चक्कर काटना मुश्किल होता है।                                                                            

एक जिला बनाने के लिए ही भारी-भरकम बजट की जरूरत होती है। उत्तराखंड राज्य तो पहले से ही कर्ज में डूबा पड़ा है। नए जिले बनने से और बोझ बढ़ेगा। राज्य के कई इलाके ऐसे हैं जो जिला बनाने के लायक हैं भी, बनाए भी जाने चाहिए। 

निंशक सरकार के कार्यकाल सन् 2011 में भी चार जिले बनाने की घोषणा की गयी थी, जो आज तक नहीं बन पाए। डीडीहाट, कोटद्वार, यमुनोत्री व रानीखेत। अब वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी कुछ जिले बनाने के संकेत दिए हैं। ये संकेत भी ऐसे समय में दिए जब पहले से ही भ्रष्टाचार के किस्से धड़ाधड़ सबके सामने उजागर हो रहे हैं। कहीं इस स्थिति में जिले बनाने का संकेत भटक न जाए? सरकार अपने वायदे के मुताबिक जिले भी बना देती है तो जो छूट जाएंगे उस क्षेत्र से सरकार को  भारी विरोध भी झेलना पड़ सकता है। 

- ओम प्रकाश उनियाल 

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