हिंदी दिवस पर विशेष : बोर्डिंग विद्यालयों के हिंदी मास्साब
हिंदी दिवस पर विशेष : बोर्डिंग विद्यालयों के हिंदी मास्साब

डिजिटल डेस्क : बिखरे बाल ; मोटा चोटा ; मटमैला हुआ खद्दर का कुरता ; ढीली-  ढाली धोती के साथ  हवाई चप्पल  चतखारते  हिंदी 'मास्साब' का ज़माना अब गया, धन्ना सेठों के देशभर में फैले  अंग्रेजी माध्यम के नये-पुराने  आवासीय बिद्यालय( बोर्डिंग स्कूल) परंपरागत हिंदी गुरुजी को  अब ' टिप-टॉप' करने में जुटे हैं।

आश्चर्य हो सकता है, परन्तु यह एक तथ्य है कि देहरादून के एक बोर्डिंग स्कूल में हिंदी अध्यापक के लिए 25 से 40 हजार का वेतन , दो कमरों का चमचमाता फ़्लैट, चौबीस घंटे इंटरनेट की निःशुल्क सुविधा, चिकित्सा, दो बच्चों की पांचवी से बारहवीं तक मुफ़्त शिक्षा आदि की चकाचौंध से युक्त नौकरी उपलब्ध है। थोड़ा कम या ज्यादा, देश के लगभग प्रत्येक अंग्रेजी माध्यम के आवासीय विद्यालय में हिंदी अध्यापक के लिए ऐसे लुभावने 'पैकेज' तय हैं।

इन आवासीय विद्यालयों में हिंदी के प्रति आये इस बदलाव  का कारण  वस्तुतः किसी प्रकार की शैक्षिक नैतिकता  या हिंदी के प्रति समर्पण नहीं है, वरन् घोर बाज़ारवाद अथवा व्यावसायिक माँग  ने इन विद्यालयों के मालिकों को ऐसा करने के लिए विवश किया है। इक्कीसवीं सदी के प्रथम चरण में  परिपक्व होकर उभरी अर्थव्यवस्था में नव धनाढ्य वर्ग ने शिक्षा के निजीकरण का पर्याप्त दोहन किया, परिणामस्वरूप  पर्वतीय एकाधिकार को तोड़ते हुए मैदानी क्षेत्रों  में भी मंहगी शिक्षा के आवासीय विद्यालयों की एकाएक  बाढ़-सी आयी। पर्वतीय और  मैदानी  अंग्रेजी  माध्यम  के आवासीय विद्यालयों में  अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए उस धनाढ्य वर्ग के पास धन का कोई अभाव नहीं था  , अभाव था तो अपने बच्चों को देने के लिए समय का ! दूसरी और एक धनाढ्य वर्ग ऐसा भी था , जिसके पास औपचारिक शिक्षा और अंग्रेजी ज्ञान बिलकुल नहीं है।

नए के साथ पूर्व स्थापित पर्वतीय बोर्डिंग विद्यालयों के मालिकों ने भी यह समझ लिया कि मैदानी बोर्डिंग विद्यालयों से  टक्कर  लेने के  लिए मात्र अंग्रेजी में गिटर- पिटर से काम नहीं चलेगा, वरन हिंदी अध्यापक की ' ट्राली' से ही अल्पशिक्षित, परंतु धनाढ्य वर्ग के बच्चों को पहाड़ तक खींचा जा सकता है, फलतः  ऐसे विद्यालयों में प्रायः उपेक्षित रहने वाला हिंदी अध्यापक एकाएक  एक  महत्वपूर्ण  ' व्यावसायिक मध्यस्थ' बन गया।  अंग्रेजी  न लिख- बोल पाने वाले धनाढ्य वर्ग के बच्चों को हिंदी अध्यापक की वाक्पटुता के बल से अंग्रेजी माध्यम के आवासीय  विद्यालयों में प्रवेश कराने का लाभप्रद कार्य आज प्रत्येक बोर्डिंग स्कूल में अत्यंत सहजता से हो रहा है।

अंग्रेजी माध्यम  के  बोर्डिंग विद्यालयों में हिंदी के अध्ययन- अध्यापन के अतिरिक्त प्रत्येक समय अंग्रेजी  बोले जाने की अनिवार्यता होती है। सर्वेक्षण किया जाए, तो  यह स्पष्ट होगा कि  इन विद्यालयों में होने  वाली वादविवाद व भाषण प्रतियोगिताओं में  हिंदी में पुरस्कार जीतने वाले  विद्यार्थियों की संख्या अंग्रेजी में पुरस्कृत होने वालों  से कहीं ज्यादा होती है। इन विद्यालयों  के प्रबंध तंत्र भले ही खुले रूप से न स्वीकारें, परंतु एक प्रतिभावान  हिंदी अध्यापक के लिए वे सदैव लालायित रहते हैं। इन  विद्यालयों में  हिंदी अध्यापकों के चयन हेतु ठीक वही प्रक्रिया अपनायी जाती है, जो अन्य विषयों के अध्यापकों के लिए, अर्थात्- मानसिक अभिक्षमता परीक्षण, लिखित परीक्षा,  कक्षा प्रदर्शन और अंत में  साक्षात्कार( सरकारी अध्यापकों के चयन से तुलना करें)।

दसवीं और बारहवीं के हिंदी अध्यापक हेतु प्रायः सभी अंग्रेजी माध्यम के आवासीय विद्यालय पी-एच.डी.  धारकों को अधिमान अथवा वरीयता देने लगे हैं, जबकि सरकारी विद्यालयों में ऐसे अध्यापकों हेतु स्नातकोत्तर व बी. एड. योग्यता निर्धारित की गयी है।

अंग्रेजी माध्यम के आवासीय विद्यालयों में  तृतीय व   चतुर्थ श्रेणी के  कर्मचारियों से मौखिक व लिखित  संवाद स्थापित  करने ले लिए प्रायः हिंदी अध्यापक की ही सहायता ली जाती है। सुबह की प्रार्थना में  भारतीय संस्कृति और सभ्यता से  परिचित कराने का दायित्व  भी प्रायः हिंदी अध्यापक ही उठाते हैं। विदेशी छात्रों को  सशुल्क अथवा निःशुल्क हिंदी ज्ञान कराने का आत्मिक संतोष इन विद्यालयों में सहज ही मिलता है।

हिंदी में  एम.ए. या पी-एच. डी. करके सभी को तो तुरंत सरकारी नौकरी नहीं मिल जाती है,ऐसे में  अंग्रेजी माध्यम के ये आवासीय विद्यालय उच्च शिक्षित हिंदी उपाधिधारकों हेतु आजीविका का भी सम्बल हैं।

मात्र सितम्बर माह में हिंदी के नाम पर छाती पीटने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि भाषा एक- दूसरे से दुराव का नहीं, वरन एक- दूजे का पूरक बनने का माध्यम है। हिंदी की सेवा करके अंग्रेजी का मेवा कैसे खाया जा सकता है, अंग्रेजी माध्यम के बोर्डिंग  विद्यालयों  के ' मास्साब' इसकी जीती- जागती मिसाल हैं !

■ डॉ. सम्राट्  सुधा 

94- पूर्वावली, गणेशपुर, 

रुड़की - 247667

उत्तराखंड 

मोबाइल - 9412956361

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