वरिष्ठ पत्रकार एवं विधायक उमेश कुमार : आशा से कहीं अधिक एक विश्वास
वरिष्ठ पत्रकार एवं विधायक उमेश कुमार

डिजिटल डेस्क : शनिवार का दिन मेरे पुराने- नये विद्यार्थियों का है, वे कॉल्स करते हैं , तो कुछ सपरिवार घर ही आ जाते हैं।

पिछले दो शनिवार से हमारे 99% विमर्श का विषय हैं- निकटस्थ विधानसभा क्षेत्र खानपुर से विधायक उमेश कुमार !  हम प्रायः राजनीति पर बातें नहीं करते हैं, लेकिन इन विधायक महोदय ने वस्तुतः हमारे विषय को परिवर्तित किया है, अपने सुकर्मों से ; आशामयी  सफलता से और अंततः अपने ही नहीं, अन्य क्षेत्र के मतदाताओं से प्राप्त स्नेह से भी !

विश्वास करना ही होता है कि 'राजा बाबू' की हेकड़ी निकाल यदि कोई उस क्षेत्र से भारी मतों से निर्वाचित हो सका ,तो वे  उमेश कुमार ही हैं ! हमें कारणों पर जाना होगा - स्पष्ट लक्ष्य कि बात राजनीति की नहीं सेवा की है ; एकमात्र ऐसे प्रत्याशी कि चुनाव का जो हो,अपने धन से सेवा कर जन को सुखी बनाना है ; निडरता और सबसे बड़ी बात मुद्दों पर नज़र या कहें पकड़ !

मैं इन दिनों चर्चित यूकेएसएसएससी (उत्तराखंड सबऑर्डिनेट सर्विस सलेक्शन कमीशन )  सम्बद्ध 'पेपर लीक प्रकरण' को सोच रहा हूँ ; घर आये स्टूडेंट्स भी वही कह रहे हैं- क्या यह प्रकरण पूरे प्रदेश में मात्र एक विधायक  उमेश कुमार को उद्वेलित कर रहा है ! आप किसी भी राजनेता की मेटा-वॉल पर घूम आइये, इनके अतिरिक्त किसी की वॉल पर उपर्युक्त पेपर लीक प्रकरण नहीं मिलेगा ; कुछ की पर कुछ-सा कुछ है, जो ना ही है ! पेपर लीक के अपराधी बहुत गहरे हैं, लेकिन धरातल पर नहीं ! विधायक  उमेश कुमार अपनी वॉल पर अनवरत पेपर लीक की परतें उघाड़ रहे हैं- सूचना ; लाइव आकर ,तो कभी तत्सम्बद्ध पेपर्स-प्रूफ़स शेयर कर। जो होना था हुआ, लेकिन प्रदेश के युवाओं सहित मुझ जैसे शिक्षक को यह सन्तोष है कि अब प्रदेश में 'कुक' यदि कुकर्म करेंगे ,तो 'किक' पड़ेगी, शायद ही अब कोई अगला पेपर लीक हो पाये !

मैं विधायक  उमेश कुमार से मात्र एक बार मिला हूँ, वॉल पर एक सन्देश भेजा ; वॉल पर ही उत्तर मिला मिलने का ; श्री हेमन्त तरानिया  (वरिष्ठ पत्रकार ) समय-निर्धारण के सहायक बने ; निर्धारित भेंट समय पर , ना कोई दिखावा ; ना कोई दूरी ...प्रदेश के कथित स्थपित राजनेता चाहें, तो सीख लें कुछ !

रही बात पेपर लीक के मुखर एवं प्रबल विरोध की, तो वह सबके बस की बात है भी नहीं ! ग्यारह वर्ष के अपने पूर्व पत्रकारिता-काल से लेकर आज तक भी मैंने  उमेश कुमार जितना परिश्रमी एवं जन-समर्पित विधायक नहीं देखा , वे पीडितजनों के लिए सांत्वना हैं , तो निस्संदेह पीड़कों के लिए काल !! दो मत नहीं कि अपनी प्रखर कार्यशैली से उन्होंने भ्रष्ट राजनीतिक कीड़ों के मन में भय पैदा किया है, जो बड़ी बात है !

विधायक  उमेश कुमार को मेटा पर फॉलो कर रहा हूँ , तो कई दिनों से आत्मा से स्वर थे, उन पर कुछ लिखूं, यह लेख उनके सच्चे व प्यारे कार्यों के प्रति मेरा नेह-प्रतिदान है ! देखे गये उनके अनेक इंटव्यूज़ से उनकी आत्मा के स्वरों को स्पर्श कर पाया हूँ, यह कह सकता हूँ , उनका प्रेरक वाक्य है-" अरे भाई, करके तो देखो ग़लत का विरोध , सुपरिणाम अवश्य मिलेंगे !"   उमेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार भी हैं, 'राजा बाबू' ने जब एक बार पत्रकारों का अपमान किया ,तो उन्होंने कहा -" पत्रकार का कोई अपमान करे, यह असहनीय बात है, लेकिन आप लोग किसी की चाटुकारिता करना और उससे डरना तो छोड़िए !" एक महिला पत्रकार ने उनसे जब 'राजा बाबू' के पत्रकारों के प्रति अपमान जनक वक्तव्य के संदर्भ में पूछा, तो उन्होंने प्रतिप्रश्न किया-"आपने स्वयं क्या विरोध किया ?"  पाठक इन उदाहरणों से वरिष्ठ पत्रकार व अब प्रदेश के सर्वाधिक सचेत विधायक  उमेश कुमार के जीवन-दर्शन को सहज ही समझ सकते हैं।

उत्तराखंड की जनता का सौभाग्य है कि प्रदेश में इस बार उन्हें विधायक उमेश कुमार जैसा कर्मठ व निडर विधायक मिल गया है ! जीवन का प्रत्येक सच्चा भाव अपने अस्तित्व के पारखी की प्रतीक्षा करता है। राजनीति शुचिता की बाट जोहती है ,शुचिता श्री उमेश कुमार जैसे राजनेता की !

उमेश कुमार की मेटा वॉल पर वर्ष 2018 के उनके संघर्ष की कथा ,उन्हीं के शब्दों में यूँ है-

"28 अक्टूबर 2018 यानी पौने चार साल पहले सुबह 8 बजे मेरे कमरे का  दरवाज़ा धड़ाम खुला ,, मेरी आँख खुली तो देखा आसपास लगभग दो दर्जन उत्तराखंड  पुलिस वाले खड़े है ।बाहर ड्रॉइंग रूम से भी शोर के आवाज़ें आ रही थी । मैंने पूछा पुलिस अधिकारी चौहान से , कैसे आना हुआ , क्या हुआ ?

बोले आपके घर के तलाशी लेनी है , मैंने कहा किस जुर्म में , बोले आप सरकार को ब्लैकमेल करना चाह रहे थे , हमारे पास सर्च वॉरंट है । 

बाहर आए तो मेरी सुरक्षा में लगे CRPF के जवानो से उत्तराखंड पुलिस कि तीखी बहस चल रही थी , मैंने कहा शांत रहो , पुलिस अपना काम कर रही है , करने दो । मै अचानक ठिठका , मैंने देखा पुलिस के साथ मेरा नौकर आयुष गौड़ भी था ।।

ख़ैर, उस समय समझ नहीं आया कि पूरी कथा का लेखक वही था ।।

28 अक्टूबर का दिन था और मै देश के मीडिया की सुर्ख़ियाँ ( इसका सार आख़िर में पढ़ना जरुर)

कट-शॉर्ट में:- पूरे घर की तलाशी ली गयी , जो ले जाना चाहते थे , सीज कर लिया गया , बस एक गलती कर गए , अलमारी में टंगी मेरी जैकेट नहीं चेक की, आगे चलकर यही जैकेट त्रिवेंद्र रावत के पतन का कारण बनी ।।

(इस जैकेट में ही त्रिवेंद्र और उनके परिवार के भ्रष्टाचार के स्टिंग विडीओ और राँची घूसकांड के सबूत रखे थे )

“कब-कब क्या हुआ”

29 अक्टूबर - उमेश शर्मा को आठ नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा

31 अक्टूबर - उमेश शर्मा की सात घंटे की रिमांड मंजूर

01 नवंबर - पुलिस ने उमेश को रिमांड पर लेकर पूछताछ और मसूरी रोड स्थित घर में तलाशी की

01 नवंबर - उमेश शर्मा के खिलाफ राजपुर थाने में एक और मुकदमा दर्ज

02 नवंबर - उमेश शर्मा को कस्टडी रिमांड पर लेने की पुलिस की अर्जी खारिज

02 नवंबर - उमेश शर्मा की जमानत निचली अदालत से खारिज

04 नवंबर - झारखंड की राजधानी रांची में उमेश के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा

07 नवम्बर इंकम टैक्स इन्वेस्टिगेशन विभाग का नोटिस 

08 नवंबर - सेशन कोर्ट में उमेश की जमानत याचिका दाखिल

11 नवम्बर Enforcement Depratment (ED) का नोटिस

12 नवम्बर FEMA के तहत नोटिस

16 नवंबर - सेशन कोर्ट ने उमेश की जमानत याचिका मंजूर की

16 नवम्बर की शाम को पुलिस-प्रशासन ने साज़िश रचकर मुझे जेल से रिहा नहीं होने दिया ।

16 नवम्बर की रात को अचानक मेरे लॉकअप में तीन लोग आए , बोले बैग तैयार कर लो , मैंने सोचा शायद अब लेट रिहा करेंगे ।

बाहर आकर पता लगा कि पुलिस की टीम जीप लेकर मुझे राजद्रोह मामले में राँची ले जाने के लिए आतुर है 

चलते-चलते पीछे से आवाज़ आयी इंजेक्शन लेते जाओ रास्ते में कमर में दर्द होगा ( मुझे स्लिप डिस्क का पेन था काफ़ी दिनो से )

इंजेक्शन लगा दिया गया।

एक दर्जन पुलिस के साथ मुझे रेलवे स्टेशन ले जाया गया , रात में जाने वाली ट्रेन से दिल्ली लेकर रवाना हुए।। सुबह 5:30 बजे दिल्ली पहुँचते ही खून की उल्टियाँ शुरू हो गयी , मुझे अंदेशा हो गया था कि मुझे ज़हर दिया गया है , साथ में जो पुलिसकर्मी थे , उनके हाथ पैर फूल गए । साथ जा रहे इन्स्पेक्टर ने अपने उच्च अधिकारियों को फ़ोन लगाया , ख़ैर , क्या बात हुयी , पता नहीं ।आनन-फ़ानन में पास के सरकारी अस्पताल में ज़ाया गया । आपातकाल वार्ड में डाक्टर ने देखा और कहा ये काफ़ी सीरीयस है , भर्ती करना पड़ेगा , कोई कहा सुनने वाला था , इन्स्पेक्टर डाक्टर को साइड में ले गया , थोड़ी देर बाद एक इंजेक्शन लगाया गया और कुछ दवाई दीं गयी और रवाना कर दिया । 

शाहदरा रेलवे स्टेशन पहुँचे , वहाँ से सुबह 8:45 पर लोकल ट्रेन द्वारा कानपुर का सफ़र शुरू हुआ । बैठने को सीट नहीं थी , कमर की हालत ख़राब हो चुकी थी , ईश्वर का शुक्र था कि खून की  उल्टियाँ बंद हो चुकी थी , मै गेट के पास नीचे ही बैठ गया ।।

15 घंटे का सफ़र करने के बाद रात में ट्रेन 12 बजे कानपुर पहुँची ।

वहाँ से आगे इलाहबाद जाना था । इलाहबाद जाने  वाली ट्रेन रात में 2:30 बजे थी , मैंने हंसते हुए पुलिसवालों से कहा , मै यहाँ बुक स्टाल के बग़ल में कम्बल बिछाकर सो रहा हूँ , जब ट्रेन आए तों उठाना , उसके बाद लेट गया , नींद कहाँ आने वाली थी ।

2:40 पर ट्रेन आयी और हम इलाहबाद के लिए रवाना हो गए , बिना आरक्षण के सीट कहाँ मिलती है रात वाली फ़ास्ट ट्रेनो में , ख़ैर हमने फिर नीचे कम्बल बिछाया और सो गए ।

सुबह ट्रेन इलाहबाद पहुँची , जैसे ही नीचे उतरे तो पता चला झारखंड एक्सप्रेस तैयार खड़ी है , जैसे तैसे भागते हुए ट्रेन पकड़ी , अब शुरू हुआ लम्बा सफ़र । 

इसमें भी आरक्षण नहीं था , हमने फिर कम्बल निकाला , बिछाया और बैठ गए । 

15 घंटे का सफ़र करने के पश्चात हम रात में लगभग 11 बजे राँची रेलवे स्टेशन पहुँचे ।।

रात राँची शहर कि कोतवाली में गुज़ारी गयी।

सुबह होते ही ज़िला न्यायालय ले ज़ाया गया , मेरे पहुँचने से पहले ही मेरे वक़ीलों की टीम तैयार खड़ी थी ।

बेल पर बहस हुयी, मामला राजद्रोह का था , झारखंड सरकार को गिराने की साज़िश करने का था तो बेल कहाँ मिलना सम्भव था , बेल ख़ारिज हो गयी।

उत्तराखंड की पुलिस टीम मुझे लेकर झारखंड की सेंट्रल जेल लेकर पहुँची ।

जेल के बड़े से दरवाज़े के अंदर जमा कराकर पुलिस रवाना हों गयी ।।

जेल के अंदर काले काले ख़तरनाक दिखने वाले क़ैदी मुझे घूर-घूर कर देख रहे थे , ख़ैर डरे तो जीवन में हम किसी के बाप से भी नही।।

कुछ समय वही बिताने के बाद बताया गया कि आपको बैरक दो दिन बाद मिलेगी , फ़िलहाल आपको मुलायजा बैरक में रहम पड़ेगा ।

जेल के अंदर का सीन बड़ा ख़तरनाक था , चारों तरफ़ ख़तरनाक अपराधी थे ,जिनमे नक्सली तल शामिल धा , ख़ैर अपन किस से डरने वाला था , हम तो फिरते ही कफ़न बांधकर है ।।

शाम का समय हुआ तों सभी क़ैदी अपनी-अपनी बैरक की में चले गए और हम अपनी।

लगभग 7 बजे एक सिपाही बैरक में आया और बोलो उमेश कुमार कौन है , मैंने हाथ खड़ा किया , उसके बाद उसने ताला खोला और मुझे अपने साथ आने को कहा । जब मै उसके साथ जा रहा था तो मन में कई ख़्याल आ रहे थे , मैंने सोचा कि यहाँ का CM जिसने त्रिवेंद्र के कहने पर FIR करवायी है, उसने शायद मेरा गेम बजाना का इंतज़ाम कर दिया है , ख़ैर , मन में आया कि देखा जाएगा जो होगा ।

हम जेल के अधीक्षक के कमरे में पहुँचे , जेल अधीक्षक बोले तुम्हारी तबियत को क्या हुआ था , मैंने सारी बात बतायी, रात में ही डाक्टरों का एक पैनल बना और मुझे सरकारी अस्पताल RIMS राँची रेफ़र कर दिया गया , वहाँ पहुँचने के बाद अगले दिन से  स्थिति और ख़राब होने लगी, इलाज का अभाव था , ना बेड था , ना डाक्टर 

अस्पताल की गैलरी में लेटकर इलाज करवाना शुरू किया गया ।ईश्वर की कृपा बनी और और मेरे भाई जैसे मित्रों के साहस और प्रयासों से राजद्रोह जैसे मामले में मात्र तीन दिन में बेल मिल गयी ।।

मामला यही नहीं रुका , जेल जैसे ही छूटने को थे , तभी जेलर ने बताया की आपको छोड़ा नहीं  जा सकता , आपका देहरादून से प्रोडक्शन वारंट आया हुआ है और आपको वापिस देहरादून जेल जाना है , यहाँ से शुरू हों गयी क़ानून की बड़ी लड़ाई । वक़ीलों ने आनन-फ़ानन में नैनीताल उच्च न्यायालय का रुख़ किया । जाको राखें साइयाँ मार सके ना कोय , ये कहावत चरितार्थ होने लगी ।माननीय 

उच्च न्यायालय ने त्रिवेंद्र रावत सरकार के परखचे उड़ा दिए और एक मामले में ज़मानत और दूसरे में वॉरंट ही निरस्त कर दिया । 

माननीय न्यायालय ने कहा कि क्यों ना इस मामले कि CBI जाँच करायी जाए , किस आधार पर उमेश शर्मा का वॉरंट लिया , ख़ैर , सरकार के काटो तो खून नहीं था ।कोर्ट ने कहा आज शाम तक उमेश शर्मा को राँची जेल से रिहा किया जाए , माननीय न्यायालय ने निचली अदालत को रिहाई सुनिस्चित करने के आदेश दिए ।

अपनी भद पिटवाने के बाद सरकार अपना सा मुँह लेकर रह गयी । अब देखिए राँची जेल प्रशासन और सरकार की बेशर्मी , उच्च न्न्यायालय से आदेश होने के बाद भी छोड़ने को तैयार नहीं थे। 

हमारे वक़ीलों ने उसी दिन कोर्ट की अवमानना की याचिका तैयार की और झारखंड हाईकोर्ट  में न्यायालय में दाखिल कर दीं , जैसे ही सरकार को याचिका की एक कॉपी रिसीव करवायी गयी, पूरा मामला समझ आते ही उनके हौश उड़ गए और मुझे हमें राँची से 29 नवम्बर को एक घंटे में रिहा रिहा कर दिया गया, जैसे ही बाहर निकल तो CRPF की बटालियन खड़ी थी , मेजर ने आकर कहा जयहिंद सर , मैंने कहा आप कैसे ? मेजर बोले , सर गृह मंत्रालय ने आपकी सुरक्षा हटायी नहीं है , आपको एयरपोर्ट तक छोड़ेंगे और उसके बाद आपको दिल्ली में आपको CRPF की बटालियन रिसीव करेगी ।

रात में विस्तारा की फ़्लाइट लेकर मै दिल्ली पहुँचा ।।

उसके अगले दिन मैंने टाइम्ज़ ऑफ़ इंडिया ने मेरा साक्षात्कार किया , मैंने कहा “ I have the sting operation of CM’ OSD, nephew and other relatives , I will fight till I get justice”

अब शुरू हुआ धर्म युद्ध , त्रिवेंद्र रावत सरकार के ख़िलाफ़ मैंने मोर्चा खोल दिया , दिल्ली में प्रेस करके सारे स्टिंग जारी कर दिए । दिल्ली से लेकर देहरादून तक हंगामा खड़ा हो गया ।इस मामले को लेकर विधानसभा सत्र में विपक्ष ने बखियाँ उधेड़ डाली । कांग्रेस ने देहरादून में बड़ी प्रेस वार्ता करके त्रिवेंद्र रावत के भ्रष्टाचार पर बड़े सवाल खड़े कर दिए ।

प्रदेश में उबाल आ गया , चारों तरफ़ सिर्फ़ हंगामा ही था ।।

इस दौरान मैंने शराब माफ़ियाँ के 200 करोड़ माफ़ करने , कोविड में हवाई मार्ग से आने वालों को पेड़ क्वॉरंटीन करने , लॉकडाउन में अमनमणि को पास देने सहित कई मामलों में जनहित याचिका डाली और सरकार को नाकों चने चबवा दिए ।।

31 जुलाई 2020 को त्रिवेंद्र रावत सरकार ने फिर मुझ पर राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज कर डाला । मेरी गिरफ़्तारी के लिए पूरी सरकार ने अपनी ताक़त झोंक डाली लेकिन मै इनके हाथ नहीं आया ।

4 अगस्त को माननीय उच्च न्यायालय ने मेरी गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी ।

इस केस में सरकार ने सारे हथकंडे अपना डाले लेकिन मेरी गिरफ़्तारी पर से रोक नहीं हटवा पाए ।।

तीन महीने की लम्बी क़ानूनी लड़ाई में सरकार ने उत्तराखंड के इतिहास में पहली बार किसी केस में देश के सारे बड़े वकील उतार दिए जिनका करोड़ों का भुगतान भी सरकार ने ही किया , लेकिन कुछ उखाड़ नहीं पायी सरकार 

27 अक्टूबर को फिर आया एतिहासिक दिन , माननीय न्यायालय ने मेरे ऊपर लगे राजद्रोह के मुक़दमे को निरस्त करते हुए तत्कालीन CM त्रिवेंद्र रावत के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के संगीन आरोप और सबूतों को देखते हुए उन पर CBI जाँच के आदेश दे डाले। यही CBI के आदेश त्रिवेंद्र के पतन का कारण बने ।

28 अक्टूबर 2018 को मै देश के मीडिया की सुर्ख़ियों में था और 28 अक्टूबर 2020 को त्रिवेंद्र रावत देश की मीडिया की सुर्ख़ियों में थे , इस पूरी कहानी का सार है कि ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं।।"

नीचे पहला चित्र रांची के एक सरकारी अस्पताल की गैलरी में इलाज के लिए लिटाये गये एक वरिष्ठ पत्रकार का वर्ष 2018 का है, तो अन्य चित्र अब उन्हीं के विधायक बनने के बाद की उनकी गौरव-गाथा के !  

किसी के सत्यता से भरे ,परन्तु कुदिन कैसे ईश्वरीय प्रताप और निजी साहस से सत्य की सफलता के सुदिन बन जाते हैं ; कैसे कोई अथाह पीड़ाओं के बाद स्वयं समर्थ हो अन्य को मुसकान बाँटता है ; कैसे कोई राजीतिक में जा राजनीति के प्रदूषण को दूर करता है और सबसे बड़ी बात कैसे कोई अपने जीवन को एक अर्थ देता है, यह सब मुझे उमेश कुमार में साकार होता दिखा है।

वह दिन ,जब वे षड्यंत्रों से घेर रांची के एक सरकारी अस्पताल की गैलरी में उपेक्षित-से लिटा दिये गये थे और आज का दिन ,जब वह उत्तराखंड के खानपुर से अप्रत्याशित विजय प्राप्त कर  विधायक हैं ,मात्र चार वर्षों का अंतर है यह ! अपनी सफलता में ईश्वर की कृपा और भाई जैसे मित्रों का सहयोग स्वीकार करना, एक सत्य के संग उनकी विनम्रता भी है। उनके प्रत्येक लेख में उन लोगों का कोई  उल्लेख नहीं, जिन्होंने उनके संघर्षों में उन्हें छोड़ा या धोखा तक दिया, यह एक साहसी व योग्य व्यक्ति की वास्तविक जीवन शैली है !

वे लिखते है-  “जीना अच्छी बात है लेकिन जो अपनी आन को बेचकर जीते है, उनका कोई सम्मान नहीं करता ! मृत्यु तो एक दिन आनी है, लेकिन जो कायर होते है, वो मृत्यु के आने से पहले ही कई बार मर जाते है, जो जीवन में अंतिम दिन तक अपना मस्तक किसी के आगे झुकने ना दे, जो वीरों कि भाँति लड़ते हुए मर जाए,  उसके जीने में भी शान है, उसके मरने में भी शान है!"

सब ऐसा सोचते हैं क्या ? सब ऐसा जीते ही कहाँ हैं!

■ डॉ. सम्राट् सुधा 

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