आत्मा और परमात्मा दोनो की भाषा हिंदी !
आत्मा और परमात्मा दोनो की भाषा हिंदी !

विश्व हिन्दी दिवस का

पावन पर्व मुबारक हो

उर्दू,मराठी,मलयालम

बंगाली,तेलगु,कन्नड़ भी

क्षेत्रीय भाषा साथ चले

ऐसा संवाद मुबारक हो

अंग्रेजी से हमे बैर नही

प्रभुत्व उसका स्वीकार नही

हिन्दी गौरव हमारा है

उसका अपमान बर्दाश्त नही

हिन्दी राष्ट्र सम्मान बने

ऐसी अभिलाषा मुबारक हो

सड़क -संसद मे हिन्दी चले

न्यायालयों मे भी हिन्दी मिले

दुनिया हिन्दी की दीवानी हो

यह सदकल्पना मुबारक हो।

हिंदी न सिर्फ जन्म की भाषा है बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के आपसी संवाद की भी भाषा है।140 देशों में विस्तारित ब्रह्माकुमारी संस्था की ईश्वरीय वाणी मुरली मूलतः हिंदी में ही उच्चारित होती है। जो शिव परमात्मा उवाच है।इसलिए हम हिंदी को आत्मा व परमात्मा दोनों की संवाद भाषा कह सकते है।

जापान में हिंदी एक कैरियर के रूप में देखी जाती है।जापान की युवा पीढ़ी दुनिया के सबसे बड़े बाजार भारत मे व्यापार के लिए हिंदी सीखने को जरूरी मानते है।तभी जापान में हिंदी सीखने का क्रेज इतना अधिक है कि प्रायः हर विश्वविद्यालय व कालेज में हिंदी विभाग खुल गया है जहां हिंदी पढाने के लिए भारतीय अध्यापको की सेवाएं ली जाती है।जापान में हिंदी अध्यापक रह चुके ऋतुपुर्ण बताते है कि जापान के हिंदी विद्यार्थी फर्राटे के साथ हिंदी बोलते ओर समझते है। हिंदी को संयुक्त अरब अमीरात में मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक भाषा का सम्मान प्राप्त है। हिंदी  भारत में लगभग 4.25 करोड़ लोगों की पहली भाषा है और करीब 12 करोड़ लोगों की दूसरी भाषा है।

हिंदी का नाम फारसी शब्द "हिंद" से लिया गया है, जिसका अर्थ है "सिंधु नदी की भूमि है।" फारसी बोलने वाले तुर्क जिन्होंने गंगा के मैदान और पंजाब पर आक्रमण किया था, 11वीं शताब्दी की शुरुआत में सिंधु नदी के किनारे बोली जाने वाली भाषा को "हिंदी" नाम दिया था।दुनिया के बहुत से ऐसे देश है जहां 'हिंदी' बोली जाती है। हिंदी को सिर्फ भारत की भाषा हम नही कह सकते।वस्तुतः हिंदी मे अ, आ,इ, ई,ओ,उ,के जो स्वर गूंजते है ,वही स्वर नवजात शिशु के रुदन से भी गूंजते है। दुनिया के सभी नवजात शिशुओं के रुदन की ध्वनि एक ही प्रकार की है।जिसमे हिंदी की ध्वनि सुनाई देती है।इसलिए हम कह सकते है कि हिंदी हर मानव के जन्म की भाषा है।चाहे फिर वह किसी भी देश या प्रांत का व्यक्ति क्यो न हो।

स्वतंत्रता संग्राम के समय भी हिंदी स्वाधीनता सेनानियों के सम्पर्क की भाषा रही,तभी तो हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा कहलाई और उसने यह सम्मान प्राप्त भी किया।हिंदी के लिए राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है।

राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है।

राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क–भाषा होती है। जिसका व्यापक जनाधार होता है।राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है।राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।हिंदी दीर्घकाल से  देश में जन–जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है। यह केवल उत्तरी भारत की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों वल्लभाचार्य, रामानुज, रामानंद ,शंकराचार्य आदि ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। अहिंदी भाषी राज्यों के भक्त–संत कवियों जैसे—असम के शंकरदेव, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर व नामदेव, गुजरात के नरसी मेहता, बंगाल के चैतन्य आदि ने इसी भाषा को अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया था।जनता और सरकार के बीच संवाद  के क्रम में जब फ़ारसी या अंग्रेज़ी के माध्यम से परेशानी हुई तो अंग्रेजों ने फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदी विभाग खोलकर अधिकारियों को हिंदी सिखाने की व्यवस्था की। यहाँ से हिंदी पढ़े हुए अधिकारियों ने भिन्न–भिन्न क्षेत्रों में उसका प्रत्यक्ष लाभ देकर मुक्त कंठ से हिंदी को सराहा। सी. टी. मेटकाफ़ ने 1806 ई. में अपने  गुरु जॉन गिलक्राइस्ट को लिखा— 'भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमाऊँ के पहाड़ों से लेकर नर्मदा नदी तक मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है, जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है। मैं कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक या जावा से सिंधु तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएँगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे।'

टॉमस रोबक ने 1807 ई. में लिखा— 'जैसे इंग्लैण्ड जाने वाले को लैटिन सेक्सन या फ़्रेंच के बदले अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए, वैसे ही भारत आने वाले को अरबी–फ़ारसी या संस्कृत के बदले हिन्दुस्तानी यानि हिंदी सीखनी चाहिए।'विलियम केरी ने 1816 ई. में लिखा— 'हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।'राष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करने के लिए हिंदी आवश्यक है।  हिंदी बहुसंख्यक जन की भाषा है, एक प्रान्त के लोग दूसरे प्रान्त के लोगों से सिर्फ़ इस भाषा में ही विचारों का आदान–प्रदान कर सकते हैं। भावी राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को बढ़ाने का कार्य  समाज सुधारकों ने किया।हिंदी पहला पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई,सन 1826 को पं॰ युगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में प्रकाशित हुआ।यह पत्र बंगाल में कोलकाता से निकला और बंगाल में ही हिंदी पत्रकारिता के बीज प्रस्पुफटित हुए।वही सन1881 में पं॰ बद्रीनारायण उपाध्याय ने ‘आनन्द कादम्बिनी’ नामक पत्र निकाला और पं॰ प्रतापनारायण मिश्र ने कानपुर से ‘ब्राह्मण’ का प्रकाशन किया। ‘आनन्द- कादम्बिनी’ ने साहित्यिक पत्रकारिता में योगदान दिया ।जबकि ‘ब्राह्मण’ ने धनाभाव में भी सर्वसाधारण तक जानकारी पहुँचाने का कार्य किया।गत एक सौ वर्ष के इतिहास में जाएं तो उस समय की प्रमुख पत्रिकाओं में इन्दु, प्रभा, चाँद, माधुरी एवं शारदा, मतवाला थी। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, निराला, महादेवी वर्मा आदि उस समय के साहित्यकारों ने ये पत्रिकाएँ निकालीं। इन साहित्यकारों ने अपने लेखों के माध्यम से जनजागृति का कार्य किया। 1909 में जयशंकर प्रसाद ने ‘इन्दु’ पत्रिका का प्रकाशन किया।

‘माधुरी’ का प्रकाशन 1921 से हुआ। यह छायावाद की प्रमुख पत्रिका थी1922 में रामकृष्ण मिशन से जुड़े स्वामी माधवानन्द के संपादनमें ‘समन्वय’ का प्रकाशन हुआ।‘सुधा’ का संपादन 1927 में दुलारे लाल भार्गव व पं॰ रूपनारायण पाण्डेय ने किया। इस पत्रिका का मूल उद्देश्य बेहतर साहित्य उत्पन्न करना, नए लेखकों को प्रोत्साहन देना, कृतियों को पुरस्कृत करना व विविध विषयों पर लेख छापना था। ‘लेकिन समय के साथ ये पत्रिकाएं दम तोड़ती गई,जो कम से कम हिंदी के लिए चिंताजनक है।अलबत्ता

ब्रह्माकुमारी संस्था की 'ज्ञानामृत' व शांति कुंज की  ‘अखण्ड ज्योति’ जहाँ धर्म और अध्यात्मको स्थान देती है।ये दोनों ऐसी पत्रिका है, जो अपने शुरूआती दिनों से आज तक बिना किसी  विज्ञापन के नियमित प्रकाशित हो रही है।इनकी प्रसार संख्या भी लाखों में है।परन्तु पराग , चन्दामामा , चंपक , चाचा चौधरी , लोटपोट , सारिका , धर्मयुग , दिनमान , साप्ताहिक हिन्दुस्तान कब से बन्द हो गए ,कुछ वर्षों पूर्व कादम्बिनी व नन्दन ने भी दम तोड़ दिया है।

सरस्वती हिन्दी साहित्य की  प्रतिनिधि पत्रिका थी। इस पत्रिका का प्रकाशन इलाहाबाद से सन 1900 ई० के जनवरी मास में प्रारम्भ हुआ था। 32 पृष्ठ की क्राउन आकार की इस पत्रिका का मूल्य 4 आना मात्र था।1903 ई० में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक हुए और 1920 ई० तक रहे। इसका प्रकाशन पहले झाँसी और फिर कानपुर से होने लगा । महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवी दत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवीलाल चतुर्वेदी और श्रीनारायण चतुर्वेदी सम्पादक हुए।  द्विवेदी जी ने साहित्यिक और राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया। द्विवेदी जी ने भाषा की समृद्धि करके नवीन साहित्यकारों को राह दिखाई। ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से ज्ञानवर्धन करने के साथ-साथ नए रचनाकारों को भाषा का महत्त्व  व गद्य और पद्य के लिए राह निर्मित की। साहित्य के निर्माण के साथ राष्ट्रीयता का प्रसार करना भी इनका उद्देश्य था।  मई 1976 के बाद इसका प्रकाशन बन्द हो गया।

नेपाल में हिंदी भाषी लोगों का दूसरा सबसे बड़ा समूह है। लगभग आठ मिलियन नेपाली हिंदी भाषा बोलते हैं। हालांकि, एक बड़ी आबादी द्वारा हिंदी बोली जाने के बावजूद, नेपाल में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता नहीं है। 2016 में सांसदों ने हिंदी भाषा को एक राष्ट्रीय भाषा के रूप में शामिल करने की मांग की थी।जो पूरी नही हो पाई।

इसी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका हिंदी भाषी लोगों के तीसरे सबसे बड़े समूह का देश है। लगभग 650, 000 लोग यहां हिंदी भाषा बोलते हैं, जो हिंदी को संयुक्त राज्य में 11वीं सबसे लोकप्रिय विदेशी भाषा बनाती है। हालांकि, अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के कारण हिंदी भाषा बोलने वाले ज्यादातर इसका प्रयोग अपने या फिर दूसरे हिंदी भाषियों के घर पर करते हैं। संयुक्त राज्य में हिंदी के मूल वक्ता बहुत कम हैं, जिनमें से अधिकांश भारत के अप्रवासी हैं।

मॉरीशस के एक तिहाई लोग हिंदी भाषा बोलते हैं। देश का संविधान राष्ट्रीय भाषा को स्पष्ट नहीं करता है, हालांकि अंग्रेजी और फ्रेंच संसद की आधिकारिक भाषा हैं। अधिकांश मॉरीशस मूल भाषा के रूप में मॉरीशस क्रियोल बोलते हैं।फिर भी हिंदी वहां सिर चढ़कर बोलती है।

हिंदी भारतीयों मजदूरों के फिजी में  आगमन के बाद अस्तित्व में आई। फिजी में ये उत्तर पूर्वी भारत से आए, जहां अवधी, भोजपुरी और कुछ हद तक मगही बोलियां बोली जाती थीं। इन बोलियों को उर्दू के साथ जोड़ा गया, जिसके परिणामस्वरूप एक नई भाषा का निर्माण हुआ, जिसे शुरू में फिजी बाट के रूप में जाना जाता था। हिंदी न्यूजीलैंड में "चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली" भाषा है। दोनों देशों के बीच बढ़ते सांस्कृतिक संबंध हिंदी अपनाने की बड़ी वजह है।वही जर्मनी में तो कई दशकों से हीडलबर्ग, लीपजिग और बॉन सहित विश्वविद्यालयों और शहरों में हिंदी और संस्कृत पढ़ाई जा रही है।सच तो यह है कि दुनिया मे एक भी देश ऐसा नही है जो पूरी तरह से हिंदी विहीन हो,यानि कम या अधिक हिंदी दुनिया के हर देश मे अपना अस्तित्व रखती है।जो हिंदी के लिए शुभ लक्षण कहे जा सकते है।

अंग्रेजी का झंझट छोड़ो

अब हिंदी की जय बोलो

कब तक हिंदी गुलाम रहेगी

सत्ताधीशों कुछ तो बोलो

हिंदी होना कब शान बनेगी

भारत की पहचान बनेगी

संसद में सिर्फ हिंदी बोलो

या फिर मातृभाषा बोलो

विदेशी भाषा का मोह छोड़ो

हिंदी से अब नाता जोड़ो

राष्ट्रभाषा बने अब हिंदी

स्वाभिमान की शान बने हिंदी।

(लेखक हिंदी चिंतक व वरिष्ठ पत्रकार है)

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की, उत्तराखंड

मो0 9997809955

Share this story