हिन्दी दिवस : हिंदी के हक़ के लिए ज़रूरी है 'एक राष्ट्र-एक भाषा' आंदोलन
HINDI-DIVAS

डिजिटल डेस्क : पिछले कुछ समय से देशभर में एक राष्ट्र एक पहचान, एक राष्ट्र एक संविधान, एक राष्ट्र एक निशान जैसे राष्ट्रवादी नारे लगातार सामने आ रहे हैं और इनका जनमानस पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ रहा है तथा राष्ट्रवादी सोच में भी

अभिवृद्धि हो रही है लेकिन न तो स्थानीय स्तर पर और नहीं क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्र एक भाषा उद्घोष कहीं सुनाई पड़ता है न ही उसके लिए कहीं संघर्ष करने की बात सामने आती है।

क्या राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिए? और हिंदी के अतिरिक्त क्या कोई दूसरी भाषा भारत राष्ट्र में राष्ट्रभाषा का स्थान ले सकती है ? बहुत स्वाभाविक उत्तर है नहीं ।

मगर हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात जब-जब उठी तब-तब ही देश के एक विशेष हिस्से से उसके विरोध के स्वर मुखरित होते चले गए और क्षुद्र स्वार्थों वाली क्षेत्रीय राजनीति हिंदी का राष्ट्रभाषा होने का हक बड़ी चतुराई से लील गई । आज परिणाम सामने है । देशभर में सबसे अधिक बोली पढ़ी व लिखे जाने वाली भाषा जिसे दुनिया भर में भर मैंडरिन के बाद दूसरा स्थान प्राप्त है अपने ही देश में राष्ट्रभाषा होने के अधिकार सुख से वंचित है।

आज चूंकि 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है इसलिए यह यक्ष प्रश्न एक बार फिर हवा में है मगर यह धरातल पर अपना उत्तर लेकर उतरेगा भी या फिर हवा में ही लटकता हुआ हवाई प्रश्न बनकर रह जाएगा इसका उत्तर सारा देश ढूंढ रहा है।

बदलता भारत दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना चुका है और आज विश्व यह मान रहा है कि मजबूत भारत की आवाज़ को अब न तो अनसुना किया जा सकता है औेर न ही भारत को अनदेखा रखा जा सकता है।

राष्ट्रभाषा बनी कमजोरी:

विश्व के हर बड़े मंच पर आज भारत का नाम फर्क डालने वाले नाम मज़बूत भारत में बदल चुका है । उसकी आवाज़ की महत्ता बढ़ी है मगर हम खुद भी नहीं जानते कि आखिर हमारी आवाज़ क्या है ? ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आवाज़ के लिये अपनी एक भाषा का होना बेहद ज़रुरी है और आज़ादी के 73 साल पूरे होने के बाद भी हमारी अधिकारिक रूप से कोई राष्ट्रभाषा ही नहीं है और अंतर्राष्ट्रय जगत में यह हमारी कमजोरी हेै ।

ग़जब, राष्ट्रभाषा ही नहीं:

संसद की कार्यवाही के लिए हमने अनेक भाषाएं चुनी हैं , संविधान की 26 वीं अनुसूची में कई क्षेत्रीय भाषाएं दर्ज हैं पर आज भी दासता की प्रतीक अंग्रेजी ही हमारी पहली भाषा के रूप में अंकित है । भले ही उत्तर भारत के निवासी भावनात्मक रूप से देवनागिरी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देते हैं पर संविधान उसे ऐसा कोई दर्जा नहीं देता और वह भी दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की तरह ही एक भाषा मात्र है जिसे राज्य व केन्द्र सरकारें अपने काम काज में लाएं या न लाएं उनकी मर्जी पर है और सरकारी प्रपत्रों में अंतिम मान्यता व आज भी अंग्रेजी की ही है अनुवाद में विवाद की स्थिति में भी अंग्रेजी का ‘वर्जन’ ही मान्य है । 

हर देश की है राष्ट्रभाषा:

आपको जानकर अचरज होगा कि पाकिस्तान , तुर्की , बहरीन फिजी व माॅरीशस जैसे छोटे - छोटे देशों से लेकर ब्रिटेन, अमेरिका, चीन व जर्मनी जैसे बड़े देशों तक सबकी अपनी एक अधिकृत राष्ट्रभाषा है और वहां का हर सरकारी काम उसी में करने की अनिवार्यता व बाध्यता है । इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ व दूसरे मंचों पर भी वें दर्ज हैं जिसका बड़ा लाभ यह होता है कि वहां अपनी बात अपनी ही भाषा में कह सकते हैं हालांकि कई बार संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी का प्रयोग हमारे प्रतिनिधि कर चुके हैं पर राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी वहां आत भी अंकित नहीं है।

हिंदी विरोध की राजनीति 

बाहर की तो छोड़िए भारत के ही कुछ राज्यों में हिन्दी का विरोध जमकर हो रहा है स्थानीयता व क्षेत्रीय हितों की हिमायत का बहाना बनाकर वहां हिन्दी का विरोध जारी है । ऐसे कई राज्य हैं जहां का सारा सरकारी काम या तो अंग्रेजी में होता है या वहां की किसी स्थानीय भाषा में । तमिलनाड़ु, आंध्र, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, असम, मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर, गोवा, महराष्ट्र आदि में हिन्दी के विरोध का सहारा लेकर सता हासिल करना एक ऐसा राजनैतिक खेल बन गया है जो खत्म होता नहीं दिख रहा है ।

अनुवाद की मार :

केन्द्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता की बात कह कर इसमें हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करती है तो इससे दूसरे कुछ राज्यों की महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ रही हैं जैसे पंजाब भी अब चाहता है कि उसे गुरमुखी में ही काम करना चाहिए , हिमाचल में भी डोगरी के प्रति जूनून बढ़ रहा है और हिन्दी प्रधान माने जाने वाले उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश , हरियाणा व राजस्थान में भी सरकारी कामों में अधिकतर पहले अंग्रेजी का प्रयोग होता है फिर उसका उल्टा - सीधा,  अटपटा सा व बेहद क्लिष्ट अनुवाद देवनागरी में किया जाता है और कई बार तो यह अनुवाद इतना स्तरहीन होता है कि हास्य का पात्र बन जाता है ।

अब ऐसी स्थिति में हिन्दी का उन्नयन व विकास हो भी तो कैसे ?

हिंदी समर्थ है पर .....

हिन्दी का प्रयोग न करने या न कर पाने के पीछे कई बार बहुत ही थोथा तर्क दिया जाता है कि हिन्दी में कारगर शब्दावली ही नहीं है । किसी हद तक यह बात एकदम गलत भी नहीं है पर यह कहना कि हिन्दी एक कमजोर या अक्षम भाषा है हज़म नहीं होता । दुनिया भर के विद्वान मान चुके हैं कि हिन्दी जैसी समर्थ भाषाएं बहुत ही कम हैं और जहां तक उसके वैज्ञाानिक व व्याकरणीय होने का प्रश्न है तो उसमें तो वह बेजोड़ व लगभग त्रुटिरहित भाषा के रूप  में उभरी है । कम से कम अंग्रेजी से तो इस संदर्भ में वह बहुत आगे है जिसका न कोई सटीक ध्वनि विज्ञान है न ही उच्चारण का वैज्ञानिक सर्वमान्य मानक ।

सीखिए औरों से:

अंग्रेजी के हिमायती यूरोपीय देशों ने भी उसका प्रयोग अपनी उन्नति में तो किया है पर वें अपनी क्षेत्रीय व स्थानीय भाएं भी बचाए हुए हैं । आज भी जर्मन, फ्रेंच, डच, बल्गारियन, जापानी, चीनी, इरानी, इराकी, कोरियन और नेपाली तक अपनी भाषा में बोलने, लिखने को गर्व के साथ प्राथमिकता देते हैं पर राष्ट्रवादी होने का दंभ पाले हम अपनी ही भाषा हिंदी में बोलने या लिखने में गर्व का अनुभव तो करते ही नहीं अपितु कई बार तो शर्मिंदगी का अहसास करते हैं ।

भारत में भी क्षेत्रीय बोलियों व भाषाओं के प्रति गज़ब का आकर्षण है । बंगाली, गढ़वाली, राजस्थानी, मराठी, कोंकणी, तामिल, तेलुगु, कन्नड़ सब प्रायः अपनी-अपनी बोलियों का इस्तेमाल खूब करते हैं मगर जब बात हिन्दी की आती है सब कहीं पीछे हटते नज़र आते हैं और इसके पीछे हटने का बहुत बड़ा कारण है क्षुद्र स्वार्थों की राजनीति ।

हिंदी का छद्म भय:

अब चलते-चलते एक नज़र इस पर भी कि आखिर हिन्दी ताकतवर व समृद्व होकर भी क्यों कमजोर पड़ रही है ? तो उसके पीछे जहां क्षेत्रीयतावाद की राजनीति व हिन्दी भाषी लोगों द्वारा अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोगों के रोजगार छीन लेने का छद्म भय खड़ा करना व क्षेत्रीय पहचान खोने का भय दिखाना है तो हिन्दी के अंदर की राजनीति भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है ।

मठाधीशी हावी :

हिन्दी के मठाधीशों ने जितना जोर अपना वर्चस्व बढा़ने में लगाया है अगर उसका शतांश भी हिन्दी के संवर्द्धन व विकास में लगाते, उसकी शब्दावली व शब्दकोष को बढ़ाते, उसे सार्थक, सरल,सहज व ऐसे उपयोगी शब्द दे पाते जो बोलने में आसान व प्रचलन में आने लायक होते, उसे क्लिष्टता के प्रेत से मुक्ति दिलाने का ईमानदार प्रयास करते, खेमेबाजी से बच, अपने और सहयाोगी बोलियों, भाषाओं के विद्वानों के साथ मिलकर काम करते, टांग खिंचाई की बजाय कुछ सार्थक करते तो हिन्दी आज सिरमौर भाषा होती ।

अनुत्तरित यक्ष प्रश्न :

अगर नेता व राजनीति लोगों को हिन्दी के विरोध हेतु आंदेालित कर सकते हैं तो हम भी तो उन्हे हिन्दी का महत्व व गौरव समझा सकते हैं। अगर राजनीति देशभक्ति का तड़का लगाकर सत्ता हासलि कर सकती है तो हम भी तो राष्ट्रीय गौरव व अस्मिता को जगाकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का उसका जायज हक दिलवा सकते हैं। पर, क्या ऐसा होगा? या क्या हिंदी के विद्वान ऐसा कर पाएंगें ? यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित है । देखें , कब व कहां से और किसके करकमलों से हिन्दी राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर चढ़ती है और चढ़ती भी या नहीं।

डाॅ0 घनश्याम बादल

( लेखक हिंदी के वरिष्ठ स्तंभकार व  साहित्यकार हैं । )

9412903681

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