हिंदी दिवस पर आलेख : हिंदी के समक्ष बाधाएं और अवसर
हिंदी दिवस पर आलेख : हिंदी के समक्ष बाधाएं और अवसर

डिजिटल डेस्क : भारत एक बहुभाषी देश है जहाँ पर सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूर्व से लेकर पश्चिम तक। चाहे वह गुजराती हो,चाहे वह मराठी हो,दक्षिण में केरल में मलयालम हो,तमिलनाडु में तमिल हो,आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में तेलुगु हो,उड़िया हो,असमिया हो या ध्रुव उत्तर में कश्मीरी हो,डोगरी हो,पंजाबी हो। ये तमाम भाषाएँ भारत में बोली जाती हैं। विगत 1000 वर्षों से हिंदी भारत की प्रधान भाषा रही है और लगभग देश की आधी आबादी अपने बोलचाल के क्रम में हिंदी भाषा का प्रयोग करती है। इन सब के बावजूद बाजारीकरण के इस दौर में जहाँ बहुत सी भाषाएँ विलुप्त होती जा रही है वहाँ पर मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हिंदी का भविष्य क्या होगा?

पूरी दुनिया में छोटी-बड़ी भाषाओं को मिलाकर लगभग 3000  भाषाएं बोली जाती है। जिसमें पूरे विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा में क्रमशः मंदारिन और अंग्रेजी के बाद हिंदी का स्थान आता है,इसके बावजूद भी कई बार हमारे मस्तिष्क में यह प्रश्न आता है कि भविष्य की हिंदी कैसी होगी? क्या हिंदी इसी तरह से आगे बढ़ती रहेगी या फिर कोई अवरोध इसके सामने खड़ा होकर इसके अविरल धारा को कुंद कर देगा ? इसे समझने के लिए हम इस लेख को दो भागों में बाँट सकते हैं-

★ *हिंदी के विकास में बाधक तत्व*

★ *हिंदी के सामने उपलब्ध अवसर*

★ *हिंदी के विकास में बाधक तत्व*

◆ *विदेशी भाषा के प्रति मोह:*

वर्तमान समय में जिस प्रकार से हिन्दी भाषी क्षेत्रों के निवासीयों के मन में विदेशी भाषा खास कर अंग्रेजी के प्रति मोह बढ़ा है वह चिता का विषय है। कहीं न कहीं हम इस मोह कि जाल में फसकर हिन्दी कि जड़ को खोखला कर रहे हैं और अपनी पहचान हिन्दी को गहरी खाई कि ओर धकेल रहे हैं।

◆ *हिंदी की सीमित सीमाएं:*

हिन्दी के छात्रों के लिए रोजगार के अवसरों कि सिमित क्षेत्र भी कहीं न कहीं इसके विकास में बाधक बनी हुई है।

◆ *हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में परस्पर विरोधाभास:*

भारत में आजादी के समय से ही भाषागत समस्याएं रही हैं। त्रिभाषा सूत्र के माध्यम से इस समस्या का हल निकलने का प्रयास भारत सरकार ने जरूर किया लेकिन वह प्रयास नकाफी साबित हुआ। भारत में क्षेत्रीय स्तर पर बोली जानेवाली भाषा हिन्दी की सहयोगिनी न होकर प्रतिस्पर्धी होती जा रही हैं जिससे हिन्दी के विकास में अवरोध उत्पन्न हो रहा है।

◆ *हिंदी की जटिल पारिभाषिक शब्दावली:*

       हिन्दी भाषा की शब्दावली में जटिल शब्दों का भरमार है जिसे समझना गूढ रहस्य को समझने के सामान है। परिनिष्ठ हिन्दी में संस्कृत के तत्सम शब्दों ने जटिलता  ला दी है इसे दूर करना जरूरी है।

◆ सरकारी कार्यालयों में हिंदी की उपेक्षा:

भारतीय संविधान के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी है लेकिन सरकारी कार्यालयों में इसे बस हिन्दी पखवारा तक ही सिमित करके रख दिया गया है। सरकारी संस्थानों में अंग्रेजी का बोलवाला है। यहाँ हिन्दी उपेक्षित सी पड़ी हिन्दी पखवारे की प्रतीक्षा में पड़ी रहती है। भारत को इससे उबरने की जरूरत है यदि वह अपनी हिन्दी को विश्वभाषा बनते देखना चाहता है तो।

★ हिंदी के लिए अवसर

◆ वैश्वीकरण के दौर में हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका:

वैश्वीकरण के इस दौर में हिंदी का कद काफी बढ़ा है। भारत के साथ-साथ विदेशों में भी हिंदी का प्रयोग करने वालों की संख्या में काफी तेजी के साथ बढ़ोतरी  हुई है। भारत एक बड़ा बाजार के रूप में पूरे विश्व में जाना जाता है,जिस कारण हिंदी के सामने अपने आप को विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने का सुनहरा मौका है। विश्व भाषा के रूप में हिंदी के स्थापित होते ही हिंदी पढ़ने और जानने वालों के लिए रोजगार के बड़े अवसर खुलेंगे जिससे हिंदी का विकास बहुत ही तेज गति से होगा।

◆ सूचना और तकनीक के युग में हिंदी का बढ़ता महत्व:

सूचना और तकनीक के इस दौर में जहाँ पूरा विश्व आधुनिकीकरण के दौर से गुजर रहा है वहाँ भारत पर भी आधुनिकीकरण का असर पड़ा है। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं तथा हिंदी के समाचार चैनलों, हिंदी सिनेमा आदि के माध्यम से हिंदी ने इस आधुनिकीकरण के दौर में अपना वर्चस्व स्थापित किया है।

◆ फिल्म उद्योग के माध्यम से फैलती हिंदी:

भारत की राजभाषा हिंदी को भारत के अहिंदी प्रदेशों के साथ-साथ विश्व मंच पर स्थापित करने में भारतीय फिल्म उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत में बनने वाली फिल्में विश्व के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शित की जाती है जिस कारण हिंदी का प्रचार बहुत ही तीव्र गति से हुआ और हिंदी भाषी लोगों के लिए रोजगार के अवसर खुले।

◆ मीडिया में हिंदी का वर्चस्व:

पत्रकारिता के क्षेत्र में चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यहाँ हिंदी भाषा के पत्रकारों,अनुवादकों, संपादकों आदि का विशेष महत्व रहा है। इस क्षेत्र में हिंदी भाषा भाषी लोगों के लिए  रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। मीडिया हाउसों के माध्यम से हिंदी का प्रचार प्रसार अहिंदी प्रदेशों में भी काफी तीव्र गति से हुआ है।

इन तमाम बिंदुओं पर गौर करने के बाद हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि कुछ एक समस्याओं के बावजूद हिंदी का भविष्य उज्जवल है। हिंदी एक वैश्विक भाषा के रूप में परिनिष्ठ होने की ओर निरंतर अग्रसर है। अगर हम भारतवासी अपनी अस्मिता,अपनी संस्कृति,अपनी पहचान को बचाए रखना चाहते हैं तो हमें अपनी राजभाषा हिंदी को सुदृढ़ करना होगा। आज मुझे हिंदी के पुरोधा लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्ति याद आ रही है, वो कहते हैं -

"निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटन न हिय के सूल।।"

                  ।!। धन्यवाद ।!।

✒️लेखक:- सुजीत कुमार संगम

प्रस्तुति :- गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम

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