आलेख : जनता के बॉयकॉट को हल्के में न ले बॉलीवुड
आलेख : जनता के बॉयकॉट को हल्के में न ले बॉलीवुड

डिजिटल डेस्क : देश की जनता को किसी भी विषय पर प्रभावित करने के लिए फिल्में सबसे बड़ा एवं प्रभावी माध्यम है। पर्दे की चकाचौंध से हर व्यक्ति आकर्षित रहता है। जिसका पूरा लाभ बॉलीवुड के ये डॉन लोग उठाते हैं। भारत में एक तरफ जहां पैगम्बर मुहम्मद के कथित अपमान को लेकर सरेआम लोगों के गले काटे जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान लगातार जारी है। हाल ही में फिल्ममेकर लीना मणिमेकलई ने 'काली' नाम से एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई, जिसमें मां काली को सिगरेट पीते हुए दिखाया गया है। लीना की इस फिल्म को लेकर हिंदुओं में जबरदस्त आक्रोश हैं।

यद्यपि बॉलीवुड लगभग पिछले 50 वर्षों से फिल्म निर्माण में मनमानी करता आ रहा है, हिंदू ब्राह्मणों को हास्यास्पद, महाजन को ठग, लोभी, चरित्रहीन तथा ठाकुर को अत्याचारी पात्र दिखाया जाता रहा है। इसके विपरीत मुस्लिम अथवा इसाई पात्र को परोपकारी, जान की परवाह न करते हुए दूसरों की मदद के लिए तैयार रहना जैसे सम्मानित दृश्यों से दिखाया गया है। 1975 में रिलीज हुई शोले फिल्म में इमाम साहब, नेत्रहीन मुस्लिम मौलवी थे जिनके बेटे को मार दिया गया था। ए के हंगल द्वारा अभिनीत, इमाम साहेब दयालु, मुस्लिम चरित्र जो लगभग हमेशा परोपकारी दिखाये गये। जिस मरुस्थलीय गांव रामगढ़ में खाने के दाने नहीं, वहां भी मस्जिद दिखाई गई।

दीवार फिल्म का पात्र अपनी माँ के साथ मंदिर तक आता है किंतु मंदिर की सीढियों के नीचे ही खड़ा हो जाता है, वह भगवान को नहीं मानता। उसी कलाकार को जब अन्य फिल्म में सीने में गोली लगती है तो जेब में पड़ा उसका 786 नम्बर का बिल्ला गोली से टकरा जाता है और उसका बाल भी बांका नहीं होता। तब फिल्मों में किसी धर्म का अपमान करने की बजाय बॉलीवुड अपनी इच्छानुसार किसी धर्म को महान व किसी को निम्न दिखाने का बड़ी सफाई से प्रयास करता था। बॉलीवुड में सार्थक-निरर्थक तथा सकारात्मक व नकारात्मक प्रयोग समय-समय पर होते रहे हैं।

संतोषी माँ जैसी फिल्मों को देखने के लिए गाँव के गाँव ट्रैक्टर-ट्रालियों, झोटा-बुग्गी व घोड़ागाड़ी से फिल्म हॉल में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। बिना लव मैटर के अंधे-लंगड़े मित्रों की कहानी को लेकर बनाई गई दोस्ती फिल्म लोगों ने दस-बीस बार देखी होगी। राजा और रंक, क्रांति, राजतिलक जैसी पुरानी फिल्मों ने जनता की भारी भीड़ को फिल्म हॉल में आकर्षित किया। राजा और रंक में यदि गाँव की पृष्ठभूमि, गरीब माँ को चित्रित किया तो क्रांति में अंग्रेजों के अत्याचार, क्रांतिकारियों के संघर्ष को चित्रित किया तथा इसी प्रकार राजतिलक में राजपरिवारों में चलती रही राजनीति को बखूबी दिखाया किंतु अब पिछले 10 वर्षों में बहुत ही सोचे-समझे योजनाबद्ध तरीके से एक ही वर्ग को लक्षित करके फिल्में बनाई जा रही है।

हिंदुस्थान के बाहुल्य समाज को अपमानित करने के पीछे बॉलीवुड का एक तथाकथित गैंग कार्य कर रहा है। वर्तमान में जनता जागरूक हो रही है। सोशल नेटवर्किंग के रूप में जनता के हाथ एक बड़ा हथियार लग गया है जिसके माध्यम से लोगों में किसी भी संवेदनशील विषयों पर खुली चर्चा का अवसर मिलता है। आज बॉलीवुड की बड़े से बड़े बजट की एक के बाद एक फिल्म बाजार में औंधे मुँह गिरती जा रही है। जनता की कमाई से अरबों रुपये कमाने वाले फिल्म निर्माता घुटनों के बल आ गये हैं। अब इन्हें जनता जनार्दन की ताकत का अनुमान होने लगा है। तभी इन अहंकारी फिल्म निर्माताओं एवं कलाकारों के ब्यान बदलने लगे हैं। जो पहले कहते थे कि जिसे फिल्म अच्छी नहीं लगती मत देखे, कौन जबर्दस्ती कर रहा है भाई , अब कह रहे हैं कि कृपया हमारी फिल्में अवश्य देखें। जो कहते थे कि बॉयकॉट एक फालतू का ड्रामा है, इससे बॉलीवुड को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे कह रहे हैं कि कृपया फिल्मों का बॉयकॉट न करें, इससे जुड़े हजारों लोगों के चुल्हें नहीं जल पायेंगे।

बॉलीवुड के बॉयकॉट के रूप में अब जनता के हाथ ब्रह्मास्त्र लग गया है। इस ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से जनता ने बड़े-बड़े फिल्मकारों के नखरे ढीले कर दिये। अब वे लगातार जनता से निवेदन कर रहे हैं कि कृपया सभी फिल्मों का बॉयकॉट न करें, जो फिल्म हिंदुओं की आस्था का अपमान कर रही है उसी का बॉयकॉट करें। अब बॉयकॉट के इस ब्रह्मास्त्र से यह तो निश्चित हो ही गया कि हिंदुओं की सहनशीलता को अब कोई भी हल्के में लेने वाला नहीं है और हिंदू आस्थाओं के अपमान के पक्ष में भी लोग घटते जा रहे हैं। अब वे स्वयं कह रहे हैं कि जो फिल्म आस्थाओं को चोट पहुंचाती हैं निसंदेह उसका बॉयकॉट होना ही चाहिए। बॉलीवुड दो हिस्सों में बंटता जा रहा है। एक जो मेहनत, ईमानदारी के साथ राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर आगे बढ़ रहे हैं, दूसरे वे जो हर कदम पर राष्ट्र को अस्थिर करना चाहते हैं या अस्थिर करने वाले लोगों से मिले हुए हैं। साथ ही वे नशे, नये कलाकारों के शोषण आदि अमानवीय धंधों से भी जुड़े दिखाई देते हैं।

फिल्म पीके के बाद तो मानो हिंदु आस्थाओं की खिल्ली उड़ाना बॉलीवुड का पसंदीदा विषय ही बन गया। 

उल्लेखनीय है कि काली फिल्म का पोस्टर सामने आते ही लोगों की नाराजगी जमकर बरस रही है। फिल्म के एक पोस्टर में देवी काली का रूप धरे एक्ट्रेस सिगरेट पीती नजर आ रही है। फिल्म की डायरेक्टर लीना मणिमेकलई के विरुध्द मामला दर्ज हो चुका है। फिल्म में जिस तरह हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया गया है, उससे लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। किंतु ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी फिल्म में हिंदू-देवी देवताओं को इस तरह से अपमान किया गया है। इसके पहले भी कई फिल्मों पर हिंदू देवी देवताओं का अपमान करने के आरोप लग चुके हैं। फिल्म 'ब्रह्मास्त्र' का ट्रेलर सामने आते ही यह विवादों में घिर गई क्योंकि इस फिल्म में मंदिर के अंदर रणबीर जूते पहने हुए दिखाई दे रहे हैं। वह जूते पहनकर मंदिर की घंटियां बजा रहे हैं। अमिताभ बच्चन, रणबीर कपूर और आलिया भट्ट अभिनीत यह फिल्म 9 सितंबर 2022 को रिलीज हो गई है। ऐसे में लोग रणबीर के साथ करण जोहर को भी ट्रोल कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर फिल्म को बायकॉट करने की मांग उठ रही है। 2014 में आई आमिर खान की फिल्म पीके में भगवान शिव के रूप में एक किरदार को दिखाया गया था। वह एलियन से डरकर टॉयलेट में भागता है। इस दृश्य को देखने के बाद फिल्म की जमकर आलोचना हुई। आमिर की फिल्म को कई लोगों ने बायकॉट भी किया।

2021 में रिलीज होने वाली वेब सीरीज तांडव में भी एक ऐसा सीन था जिसे देखकर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची थी। एक स्टेज शो के दौरान कलाकार जीशान अयूब भगवान शिव के रूप में नजर आते हैं। वेब सीरीज में जीशान को विवेकानंद नेशनल यूनिवर्सिटी के एक छात्र 'शिवा शेखर' के किरदार में दिखाया गया है। इस नाटक में वह हाथ में त्रिशूल और डमरू लेकर मंच पर आते हैं, लेकिन इस दौरान दर्शक आजादी-आजादी के नारे लगते हैं, लेकिन जीशान अयूब इस जगह पर एक आपत्तिजनक शब्द बोलते हैं। भगवान शिव के रूप में ऐसे शब्द मुंह से निकालने पर जीशान के साथ फिल्म निर्माता को भी जनता के क्रोध का शिकार होना पड़ा। आपको अक्षय कुमार की फिल्म जिसका नाम पहले लक्ष्मी बॉम्ब रखा गया था, जिस कारण इसका काफी विरोध भी हुआ। अक्षय कुमार, धनुष और सारा अली खान की फिल्म 'अतरंगी रे' बीते साल रिलीज हुई थी। इस फिल्म में ऐसे कई दृश्य थे जो हिंदू धर्म के देवी-देवताओं और धर्मग्रंथों का अपमान करने वाले थे। फिल्म में भगवान शिव और हनुमान जी को लेकर अपशब्दों बोले गए साथ ही राम चरित मानस की भी आपत्तिजनक व्याख्या की गई है। फिल्म का एक दृश्य है जो ट्रेलर में भी दिखाया गया है, जिसमें सारा अली खान कहती हैं, 'हनुमान जी का प्रसाद समझे हैं, जो कोई भी हाथ फैलाएगा और हम मिल जाएंगे?'

अनुराग बसु की फिल्म लूडो में सांकेतिक रूप से हिन्दू संस्कृति को चोट पहुँचाने की कोशिश की गई। इस फिल्म में स्वांग रचने वाले तीन लोग ब्रह्मा, विष्णु, महेश का रूप बना सड़क पर नाचते-कूदते दिखाया गया है। इतना ही नहीं, एक सीन में तो भगवान शंकर और महाकाली को गाड़ी में धक्का लगाते हुए भी दिखाया गया है। वेब सीरिज ए सूटेबल ब्वॉय में मंदिर प्रांगण में अश्लील सीन फिल्माने के साथ ही लव जिहाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा। इस फिल्म को लेकर हिंदू संगठनों ने जमकर विरोध किया था। फिल्म सेक्सी दुर्गा के टाइटल को लेकर जमकर बवाल हुआ था। बाद में सेंसर बोर्ड ने फिल्म का नाम एस दुर्गा करवा दिया था। 

वास्तव में बॉलीवुड फिल्मों में हिंदू धर्म की गिरावट, भारतीय समाज में धर्म के महत्व की जानबूझकर अनदेखी धर्म को नुकसान पहुंचाकर हमारी उन पोषित परंपराओं को कमजोर किया जा रहा है जिनके महत्व की भारतीय समाज में व्यापक स्वीकृति रही।

कुछ दिन पहले ‘तान्हाजी’ फिल्म देखी। उसे देखकर लगा कि ‘भगवान’ ने बॉलीवुड की धारा में फिर से दस्तक दी है। इसमें दिखाया गया कि दुर्ग पर धावा बोलने से पहले तान्हाजी मंदिर में पूजा करते हैं। ऐसे दौर में जब लगा कि बॉलीवुड ने भगवान को लगभग भुला ही दिया, वहां इस फिल्म में भगवान के अस्तित्व का महत्त्व दर्शाया गया है। 

आज के फिल्म निर्माताओं को पुरानी फिल्मों को याद करना चाहिए, जिनमें दर्शकों की आस्था को चुनौती देने के साथ ही भगवान की शरण में जाने वाले दृश्य भी थे। ऐसी फिल्मों का अंत अमूमन आस्था और अच्छे मूल्यों की पुनर्स्थापना के साथ होता। तमाम फिल्मों में अदालती कार्यवाही के दौरान गीता पर हाथ रखकर गवाही देने वाते दृश्य याद आते हैं। यद्यपि बॉलीवुड अतीत की तुलना में आस्था को अब उतना महत्व नहीं देता, बल्कि उसका उपहास ही अधिक उड़ाता है। इससे भारत में आस्था की विकृत व्याख्या का जोखिम बढ़ा है और तमाम स्वयंभू इसका फायदा उठाते हैं। इस तरह हम शायद उस स्थिति से परे जा चुके हैं जिसमें धर्म का ऐसा महिमामंडन होता था जो हमारे मूल्यों को संरक्षित करता था। उसके उलट अब ऐसी स्थितियों से दो-चार हो रहे हैं जहां धर्म को नुकसान पहुंचाकर हमारी उन पोषित परंपराओं को कमजोर किया जा रहा है जिनके महत्व की भारतीय समाज में व्यापक स्वीकृति रही है। 

कुछ पुरानी बॉलीवुड फिल्मों में भगवा तिलक फिल्म में खलनायक का प्रतीक था और अब वैष्णव तिलक और त्रिपुंड भी खलनायक के माथे पर सजते हैं। खलनायक संजय दत्त को हिंदू साधु की तरह क्यों दिखाया गया। आप बिना किसी हिंदू चिन्ह के खलनायक दिखा सकते थे। फिर से एक तिलक धारी हिंदू को खलनायक के रूप में दिखाया जा रहा है। ऐसा लगता है कि बॉलीवुड को सनातन संस्कृति के साथ छेड़खानी में अत्यधिक आनंद आता है। 

बॉलीवुड हमेशा हिंदुओं को नकारात्मक भूमिका में दिखाने की कोशिश करता है। ढाई घंटे की बेसिरपैर की फिल्म ‘लूडो’ का एक ही मकसद है। सीधे-सीधे हिन्दू धर्म का उपहास करना। सांकेतिक रूप से पूरी फिल्म में हिन्दू संस्कृति को चोट पहुँचाने की कोशिश की गई है। लड़कियों के शोषण के आरोपित अनुराग बसु द्वारा इस फिल्म में हिन्दू त्रिदेवों का बेशर्मी से मजाक बनाया गया है और उसको बिलकुल उस ढंग से ही फिल्माया गया है, जिस ढंग से आमिर खान की ‘पीके’ फिल्म में दिखाया गया था। स्वांग रचने वाले तीन लोग ब्रह्मा, विष्णु, महेश का भौंडा सा रूप धरे सड़क पर नाच-कूद कर रहे हैं, जिन्हें देख कर फिल्म का हीरो आदित्य रॉय कपूर वितृष्णा के भाव से मुंह बना रहा है। एक सीन में तो भगवान शंकर और महाकाली गाड़ी को धक्का भी दे रहे हैं। जान-बूझकर इस तरह से कुछ हिन्दी फिल्मों में हिन्दुओं के देवी-देवताओं को फूहड़ स्वांग रचा कर पेश किया जा रहा है और उनको तरह-तरह की घटिया हरकतें करते दिखाया जा रहा है जो भारत में हिन्दू धर्म-संस्कृति के विरुद्ध चली आ रही पुरानी फिल्मी साजिश को आगे बढ़ाने की नीच कोशिश है। पत्रकार द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपकी फिल्म का बॉयकॉट क्यों हो रहा है तो अनुराग ने कहा मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैं यहां नहीं तो विदेश में जाकर फिल्म बना लूंगा। यह मानसिकता चिंतनीय है। 

आईआईएम अहमदाबाद के एक प्रोफेसर ने रिसर्च की है कि बॉलीवुड फिल्में हिंदू और सिख धर्म के विरुद्ध लोगों के दिमाग में जहर घोल रही है तो प्रश्न यह उठता है कि क्या भारतीय सिनेमा मजहबी कट्टरपंथियों का हथियार बन गया है। अब भारत बदल रहा है। इस नये भारत में फिल्म निर्माण में जुड़े लोगों को अपनी मानसिकता को बदलना होगा अन्यथा जनता के बॉयकॉट को चलते उन्हें खाने के भी लाले पड़ जायेंगे। 

स्तंभकार : 

डॉ उमेश प्रताप वत्स

umeshpvats@gmail.com

#14 शिवदयाल पुरी, निकट आइटीआइ

यमुनानगर, हरियाणा - 135001

9416966424

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