आईआईटी रुड़की ने तीसरे डॉ. ए एन खोसला एंडाउड लेक्चर का किया आयोजन

अस्थिरता से स्थिरता की ओर अग्रसर भारतीय जल प्रबंधन : अवसर एवं चुनौतियां - प्रो. असित के. बिस्वास

आईआईटी रुड़की : आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग ने ‘‘अस्थिरता से स्थिरता की ओर अग्रसर भारतीय जल प्रबंधन: अवसर और चुनौतियां‘‘ के विषय पर तीसरा डॉ. ए. एन. खोसला योगदान व्याख्यान शृंखला का आयोजन किया। इसके मुख्य वक्ता प्रो. असित के. विश्वास थे।

आयोजन के आरंभ में प्रो. आशीष पांडे, प्रमुख, डब्ल्यूआरडी एवं एम विभाग ने योगदान व्याख्यान शृंखला की अहमियत बताई। उन्होंने कहा कि इस विभाग के संस्थापक निदेशक डॉ. ए एन खोसला के सम्मान में योगदान व्याख्यान शृंखला शुरू की गई। डॉ. अजुधिया नाथ खोसला एक प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर थे जो बाद में राजनेता बन गए।

वे भारतीय केंद्रीय जलमार्ग सिंचाई एवं नेविगेशन आयोग (अब केंद्रीय जल आयोग) के अध्यक्ष थे। डॉ. ए एन खोसला 1954 से 1959 तक रुड़की विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। उन्हें 1954 में पद्म भूषण और 1977 में पद्म विभूषण सम्मान दिए गए। वे राज्यसभा के सदस्य और ओडिशा के 11 वें राज्यपाल थे।

मुख्य वक्ता का परिचय देते हुए डब्ल्यूआरडी एवं एम विभाग के प्रो. एम. एल. कंसल ने बताया कि प्रो. असित के. बिस्वास यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो, यूके के जाने-माने विजिटिंग प्रोफेसर हैं। उन्होंने प्रो. बिस्वास को पूरी दुनिया में जल, भोजन, पर्यावरण और विकास जैसे विषयों का अग्रगण्य विद्वान बताया। प्रो. बिस्वास अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड, पिक्टेट एसेट मैनेजमेंट, जीनेवा जैसे प्रतिष्ठित संगठनों में सदस्य आदि विभिन्न पदों पर सुशोभित रहे हैं; भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर के सलाहकार बोर्ड के सदस्य; और सिंगापुर अंतर्राष्ट्रीय जल सप्ताह के रणनीतिक सलाहकार हैं।

‘‘अस्थिरता से स्थिरता की ओर अग्रसर भारतीय जल प्रबंधन: अवसर एवं चुनौतियां‘ के विषय पर निजी अनुभव बताते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मसला है जिसका अविलंब समाधान आवश्यक है और इसके लिए हम सभी को मिल कर काम करना होगा,’’ प्रो. असित के. बिस्वास ने बताया।

प्रो. असित के. बिस्वास ने बताया कि 1960 के दौरान भारत की लगभग 18 प्रतिशत आबादी ही में शहरों में रहती थी, जो अब दोगुनी हो गई है। उन्होंने कहा कि जल प्रबंधन कोई ‘रॉकेट साइंस’ (बहुत कठिन काम) नहीं है। उदाहरण के लिए एक संस्थागत सुधार से मुख्य शहरी केंद्रों में व्याप्त पानी की 60 प्रतिशत समस्याओं का समाधान 4-6 वर्षों के अंदर हो सकता है और वह भी किसी अतिरिक्त लागत के बिना। बाकी 40 प्रतिशत का समाधान अगले 4-5 वर्षों में किया जा सकता है जिसके लिए इस स्तर की वित्त व्यवस्था और क्षमताओं का उपयोग करना होगा।

हमें ‘सामान्य काम-काज‘‘ के बजाय ‘लीक से हट कर काम करना’ होगा जो सफलतापूर्वक लागू करने योग्य हों। उन्होंने बताया कि धरती के नीचे से निरंतर जल निकलाने का यह परिणाम है कि भारत-गंगा जल क्षेत्र दुनिया का सबसे अधिक जल स्तर गिरावट वाला क्षेत्र बन गया है। जल प्रदूषण की समस्या भी गहरी होगी जो पहले से ही पूरी दुनिया के सबसे गंभीर मुद्दों में से एक है। इस व्याख्यान में लीक से हट कर कई समाधान पेश किए गए जिनसे लगभग एक दशक में भारत का जल प्रबंधन कार्य अस्थिरत से स्थिरता की ओर अग्रसर हो सकता है। कार्यक्रम का संचालन प्रो. मोहित प्रकाश मोहंती ने किया और डब्ल्यूआरडी एवं एम विभाग के प्रो. दीपक खरे ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

डब्ल्यूआरडी एवं एम विभाग का परिचय

जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग की स्थापना एशिया, अफ्रीका और सुदूर पूर्व देशों (डब्ल्यूआरडीटीसी) के लिए जल संसाधन विकास प्रशिक्षण केंद्र के रूप में 25 नवंबर, 1955 को रुड़की विश्वविद्यालय में की गई। इसकी स्थापना डॉ. ए एन खोसला ने की थी। इसे स्थापित करने की पहल ईसीएएफई के कार्यकारी सचिव डॉ. पी.एस. लोकनाथन और ईसीएएफई के बाढ़ नियंत्रण प्रभाग के अध्यक्ष डॉ. शेन-यी ने की थी। वे 1951 से निरंतर डॉ. ए.एन. खोसला से संपर्क-सलाह करते रहे। डॉ. खोसला उन दिनों केंद्रीय जल एवं विद्युत आयोग के अध्यक्ष और बाद में रुड़की विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस तरह भारत सरकार की सहायता से जल संसाधन विकास प्रशिक्षण केंद्र (डब्ल्यूआरडीटीसी कहा जाता है) खोलने का निर्णय लिया गया जो रुड़की विश्वविद्यालय अभिन्न हिस्सा बन गया।

पहले कोर्स की शुरुआत 02 अप्रैल, 1956 को हुई और यह 31 मार्च, 1957 को पूरा हुआ। भारत की विभिन्न जल परियोजनाओं – भाखड़ा, हीराकुंड, इडुकी, इंदिरा सागर, कोटा बैराज और टिहरी बांध आदि के निर्माण में इस विभाग का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। विभाग के शिक्षक इस क्षेत्र में देश के सर्वोच्च स्थानों पर पहंुचे और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं।

डब्ल्यूआरडीटीसी के बारे में

विभाग की स्थापना डॉ. ए.एन.खोसला की सहायता से 1955 में की गई। एशिया अफ्रीका सम्मेलन, बांडुंग (इंडोनेशिया) में भारत की प्रतिबद्धता को पूरा करते हुए एशियाई अफ्रीकी केंद्र के रूप में इसकी स्थापना की गई थी। इसमें जल संसाधन विकास एवं सिंचाई जल प्रबंधन में प्रयोग आधारित पोस्टग्रैजुएट डिग्री प्रोग्राम हैं जो मुख्य रूप से सेवारत इंजीनियरों (सिविल, इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल) और कृषि वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण के लिए हैं।

विभाग के विभिन्न प्रोग्राम में प्रवेश के लिए उम्मीदवार के संगठन से स्पांसरशिप आवश्यक है। विभाग में शिक्षाविदों और फील्ड इंजीनियरों का सही तालमेल है जो जल संसाधनों एवं जल विद्युत परियोजनाओं की योजना, डिजाइन, निर्माण, संचालन और रखरखाव में लंबा अनुभव रखते हैं ताकि प्रयोग आधारित शैक्षिक प्रोग्राम लागू करने में मदद करें। विभाग जल संसाधन, जल विद्युत और सिंचाई प्रबंधन के क्षेत्र में शोध, विकास और विस्तार के कार्यों में सक्रिय है।

यह विभाग सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण, जल निकासी, भूजल विकास और बिजली क्षेत्रों के लिए सलाह सेवाएं देता है। इसका उद्देश्य ऐसे मानव संसाधन का विकास करना है जो उपलब्ध जल संसाधनों के विकास में स्थिरता और पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन की जिम्मेदारी पूरी करे। कोर्स में पानी के उपयोग के गैर-पारंपरिक तरीके जैसे क्रॉपिंग सिस्टम मॉडलिंग और नियोजन, इंटर-बेसिन स्थानांतरण, वर्षा जल संचयन के माध्यम से भूजल पुनर्भरण जैसे विषय विशेष रूप से शामिल किए गए हैं। विभाग ने अब तक भारत सहित 52 देशों के 2800 से अधिक सेवारत इंजीनियरों और कृषि वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया है।

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