हिंदी पत्रकारिता दिवस विशेष :- अहम् और वहम से बचे हिंदी पत्रकारिता

दशा व दिशा पर लगाम और पत्रकारों को संरक्षण समय की ज़रूरत

आज जब सारी दुनिया कोरोना संक्रमण की महामारी के दौर से गुजर रही है और चारों तरफ एक संकट एवं संभ्रम की स्थिति नजर आ रही है तो ऐसे में हालात की सटीक एवं नवीनतम जानकारी देने के लिए हर व्यक्ति की निगाह मीडिया पर टिकी हुई है । यह वह दौर है जब मीडिया केवल सूचना मात्र देने का प्लेटफॉर्म नहीं रह गया है अपितु वह एक अहम भूमिका अदा करने लगा है। मीडिया के रूप में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया के मुकाबले कहीं अधिक प्रभावशाली एवं सक्रिय माना जाने लगा है लेकिन फिर भी प्रिंट मीडिया का अस्तित्व बचा हुआ है। आज 30 मई को उस हिंदी पत्रकारिता की जयंती है जो कभी देश की दशा एवं दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका अदा करती थी मगर अब हालात वैसे नहीं रह गए हैं। आज जब हिन्दी पत्रकारिता एक दृष्टिपात करते हैं तो स्पष्ट दिखता है कि आज की हिन्दी पत्रकारिता जिस मुकाम पर खड़ी है, वह बहुत ज्यादा ‘कम्फर्टजोन’ नहीं है। आज वह कभी अपने उत्कर्ष पर नज़र आ रही है तो कभी गहरी खाई में। कभी नए मानक गढ़ती लगती है तो कभी पुराने मूल्यों को नष्ट करती दिखती है। आज की उसकी दशा और दिशा से उसके भविष्य का अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल काम हो गया है ।

संक्रमण का यह दौर :

जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह पत्रकारिता में भी बदलाव आए हैं वहां भी ऊंच – नीच हुई है, आरोह-अवरोह आए हैं कई संदर्भों में हिन्दी पत्रकारिता आगे आई है तो कई मोर्चो पर वह बदहाल हुई है । कुछ मोर्चों पर वह नेतृत्व करती दिखती है तो कहीं पर उसने पुराना गौरव खो दिया लगता है । परिवर्तन की बयार में उसने नवीनता का परचम भी फहराया है और नए के नाम पर अनाप शनाप प्रयोग भी झेले हैं । बेशक हिंदी पत्रकारिता के लिए यह एक संक्रमण काल है ।

कहां गई पुरानी पत्रकारिता? :

कहने को कुछ भी कह लिया जाये पर पत्रकारिता के पेशे से जुड़े पुराने लोग आज की पत्रकारिता से तारतम्य बैठाने में कष्ट महसूस करते हैं , उन्हें अपने समय के और आज के पत्रकारिता के सिद्वांतों में सामंजस्य बैठाना नामुमकिन लगता है । उनका सीधा सीधा आरोप है कि आज की पत्रकारिता सिद्वांतवाद की पटरी से उतर गई है , आज उन्हे लगता है कि पत्रकारिता में ऐसे तत्व घुस गए हैं जिनका लक्ष्य धनार्जन, शक्ति केंद्र बनना,बनाना और अपने स्वार्थ पूरे करना, मात्र रह गया है।

आरोप ही आरोप :

पुरानी पीढ़ी का आरोप है कि आज सकारात्मक खबर को न छापना या फिर इस तरह से छापना कि उसका महत्व ही खत्म को जाए शर्म का विषय नहीं रह गया है ,आरोप यह भी है कि पत्रकारिता से मानक , मूल्य , नैतिकता , उत्तरदायित्व की भावना, छापने सें पहले खबर के ‘आफ्टर इफेक्ट’ का ईमानदार आकलन करना पत्रकारिता से गायब से होते जा रहे हैं । ऐसे में व्यवसाय मात्र ही बनकर रह गई पत्रकारिता से मिशनरी भाव प्रायः प्रायः समाप्त ही हो गया लगता है ।

पत्रकारिता का आचरण:

बेशक ये आरोप एक कड़वा सच है और इनमें उस पीढ़ी की पीड़ा छिपी है ,जिसने पत्रकारिता को एक मिशन के तौर पर अपनाया था, यह वही पीढ़ी है जिसके जमाने में पत्रकारिता आजीविका नहीं बल्कि, एक मिशन हुआ करती थी यें आरोप न तो एक सिरे से खारिज किये जा सकते हैं, और न हीं उन्हे पूर्णतया सही कहा जा सकता है । ये लोग पार्टटाईम संवाददाता, खोजी पत्रकार, समाज के लिए कुछ करने की धुन वाले लोग थे, यह वह जमाना था जब पैसा कमाने की प्रवृत्ति को पत्रकारिता में हेय दृष्टि से देखा जाता था बहुत ही सीमित संसाधनों व जरुरतों वाले यें लोग समर्पण को ही सर्वस्व मानते थे। एक बात और उस ज़माने में आदमी की इज्जत पैसे नहीं अपितु उसके आचरण, , व्यवहार, ईमानदारी और नेकनीयत से आंकी जाती थी । यह वह ज़माना नहीं था जहां आज की तरह सब कुछ ताकत पैसा या पॉवर तय करते थे । बेशक तब के पत्रकार और पत्रकारिता का आचरण और स्वरूप भी वैसा ही था , उसे तब के ही मानकों के अनुसार इज्जत बख्शी जाती थी ।

दिशाहीन हो रहा चौथा खम्भा?:

तो क्या मान लें कि लोकतंत्र का चौथथा स्तंभ कहे जाने वाला मीड़िया देश व समाज को दिशा देने के बजाय, काल के प्रवाह में सही या गलत की परवाह किए बगैर बह गया है ? मूल्यों पर टिकने की बजाय बिकने को वरीयता दे रहा है ? वह समाज व देश को सही पटरी पर लाने के बजाय खुद उसी राह पर चल पड़ा है जिस पर दूसरों के चलने की शिकायत वह स्वयं करता रहा है और यदि वह ऐसा कर रहा है तो फिर यह देश व समाज उस पर क्यों और किसलिए विश्वास करे ? क्या भारत में वह समय सचमुच ही आ गया है ,जब मूल्यों को ताक पर रखा जा सकता है ? शायद ऐसा वक्त यहां अभी नहीं आया है और अगर आ भी रहा है तो उसे रोकने का उत्तरदायित्व भी जिस पर सबसे ज्यादा है वह पत्रकारिता ही तो है ।

इलेक्ट्रोनिक मीड़िया से मुकाबला:

भले ही आज प्रिन्ट मिड़िया पर इलेक्ट्रोनिक मीड़िया हावी हो रहा है पर, आज भी आम आदमी के लिए अखबार से बढ़कर विश्वसनीय सूचना का माध्यम कोई दूसरा नहीं है , अखबार न केवल उसकी पंहुच में है अपितु उसके घर सवेरे ही न के बराबर कीमत पर पंहुच भी जाता है। पर, आज विभिन्न कारणों से अखबार की विश्वसनीयता व नीति तथा नीयत पर ही शक किया जा रहा है । खास तौर पर आज भी हिन्दी अखबारों को अंग्रेजी के न्यूज़पेपर्स के मुकाबले दोयम दर्जे का माना जाता है और इसे एकदम से खारिज़ भी नहीं किया जा सकता है। आज भी खबर व गेटअप के मामले में वें हमसे आगे हैं, जितने नवाचार वहां हो रहे हैं हिन्दी अखबारों में नहीं, विज्ञापन भी ज्यादा वहीं पहुंच रहे हैं। नया शगूफा ये भी आया है कि कुछ हिन्दी अखबारें ने तो, विदेशी लेखकों के अनुदित लेख छाप कर खुद के अग्रणी होने का अहम् और वहम पाल लिया है, एक प्रकार से इस बात मोहर लगाना है कि हमारे लेखक चूक गए हैं, नए विचारों का अकाल पड़ गया है। क्या इस स्थिति को अच्छा कहा जा सकता है?

संकट में साख:

आज की पत्रकारिता कई संकटों का सामना एक साथ कर रही है, सबसे बड़ा संकट जिस विंग पर आया है वह प्रिंट मीड़िया ही है । यहां बार – बार हल्ला मचता रहा है कि लगातार बढ़ते इलेक्ट्रोनिक मीड़िया के चलते प्रिंट मीड़िया का आकर्षण अवसान की ओर है और बहुत जल्दी ही इलेक्ट्रोनिक मीड़िया उसे लील जाएगा, मगर ऐसा नहीं हुआ है तो यह प्रिंट मीड़िया की विश्वसनीयता और उसकी गहरी जड़ों की ही वजह से हुआ है । पर, ऐसा भी नहीं है कि यह संकट टल गया है और प्रिंट मीड़िया के अलम्बरदार चैन की नींद सो जाएं या फिर मनमाने तरीके से चलने की भूल करने लगें। आज प्रिंट मीड़िया को अपनी साख को बचाने के लिए बहुत कड़ी मेहनत के साथ एक ‘वाॅचडाॅग’ यानि सजग प्रहरी की भूमिका भी निबाहनी होगी और इस क्षेत्र में बढ़ रही अवांछित तत्वों की सक्रियता को रोकना व खत्म करना होगा।

बढ़ता हस्तक्षेप :

पत्रकारिता में अखबार, पत्रिकाओं व इलेक्ट्रोनिक मीड़िया सारे ही क्षेत्रों में पिछले कुछ समय से औद्योगिक घरानों, धनाढ्यों, प्रचार के भूखे लोगों व संस्थाओं ने जिस धड़ल्ले से प्रवेा किया है उस पर एक सतर्क नजर रखने की भी जरुरत है, भले ही इनकीे की वजह से आज मीड़िया कर्मियों को मोटे ‘पे पैकेज’ मिल रहें हैं पर, दूसरा सच यह भी है कि यें तत्व आपको मनमाफिक तरीके ‘यूज’ भी कर रहें हैं जिसकी कीमत भी अंततः आपको ही चुकानी है। आज प्रिंटमीड़िया की प्रतिष्ठा व विश्वसनीयता में कमी आई है तो इसकी एक वजह इन मालिको का सम्पादन के क्षेत्र में गहराता हस्तक्षेप भी है । निःसंदेह, भूखे पेट पत्रकारिता करना आसान नहीं, पर मूल्यों व नैतिकता को बचाए रखने के लिए कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी और यह जितनी जल्दी होगा हिंदी पत्रकारिता की प्रतिष्ठा उतनी ही बढ़ेगी। यदि आज के आम पत्रकार के जीवन पर दृष्टि डालें तो ऐसा लगता है कि जैसे वह हथेली पर जान एवं पेट में भूख रखकर पत्रकारिता कर रहा है। बड़े-बड़े पत्रकारों, स्तंभकारो एवं संपादकों की बात छोड़ दें तो कस्बा गांव एवं उप नगरों का संवाददाता आज भी बिना नियमित वेतन के काम करने को विवश है । यह उसका जुनून ही है कि वह कोरोनावायरस जैसी मारक महामारी के इस दौर में भी अपनी जान हथेली पर रखकर समाचार एकत्र करने का काम कर रहा है । दुखद स्थिति यह भी है कि अखबारों के मालिक या प्रबंध संपादक उनकी आर्थिक स्थिति की ज्यादा चिंता करते नहीं दिखते । उनका आज भी न कोई बीमा होता है न ही जीवन यापन के लिए नियमित आय के संसाधन। अधिकांश संवाददाता अपने निजी व्यवसाय से अपना जीवन चलाते हैं। पत्रकारिता से अर्जन करने के बजाय उसमें अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा खपा देते हैं। भले ही यह भी सच है कि कुछ अवांछित तत्व पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे में अपवित्र काम कर कुछ धन अर्जन कर रहे हैं लेकिन अभी भी बहुतायत ऐसे ही जुनूनी लोगों की है जो पत्रकारिता महज शौक के लिए करते हैं और इनमें से अधिकांश गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार होते हैं जिन्हें कोई दुर्घटना होने पर न तो सरकार और न ही अखबार से कोई संरक्षण या मदद मिल पाती है। यदि हिंदी पत्रकारिता को बचाना है और उसे पवित्र रखना है तो इनकी न केवल खैर – खबर लेनी होगी बल्कि उन्हें पर्याप्त संरक्षण भी देना होगा।

– डाॅ0 घनश्याम बादल ,
9412903681
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व वरिष्ठ स्तंभकार हैं । )

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