देवपथ विशेष रिपोर्ट : उत्तराखंड से हटे तीरथ, पुष्कर की पीठ पर पहाड़

डिजिटल डेस्क : महज 114 दिन के बाद ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने आखिरकार त्यागपत्र दे दिया और खटीमा के तेजतर्रार युवा विधायक पुष्कर धामी 3 जुलाई को शाम 6:00 बजे उत्तराखंड की कमान मुख्यमंत्री के रूप में संभाली।

राजनीति में व्यक्तियों का आना – जाना एक आम बात है ।‌ एक व्यक्ति जब मुख्यमंत्री नहीं होता है तब वह तत्कालीन मुख्यमंत्री के कार्यों में अनेक कमियां ढूंढ लेता है, अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते अपनी पार्टी के आलाकमान को अपने तरीके एवं दल-बल के साथ इन कमियों को इस लक्ष्य के साथ प्रेषित करता है कि उच्च पद पर स्थित व्यक्ति बदले तो राज्य में पार्टी की स्थिति में सकारात्मक सुधार होगा । साधारण सी बात है कुर्सी खाली होने पर उसके लिए भी एक संभावना पैदा होती है। उत्तराखंड भी राजनीतिक खेल के इस मनोविज्ञान से अछूता राज्य नहीं है।‌

सन 1999 में अस्तित्व में आए इस राज्य को बने हुए अभी 22 वां वर्ष ही चल रहा है लेकिन स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर किसी भी मुख्यमंत्री ने अब तक अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया और पुष्कर धामी इस राज्य के 11 में मुख्यमंत्री के रूप में सत्तासीन हुए हैं।

1999 में उत्तरांचल के नाम से अस्तित्व में आए देश के 26 में राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में नित्यानंद स्वामी अटल बिहारी वाजपेई की कृपा के चलते मुख्यमंत्री बने इससे पूर्व उत्तर प्रदेश में मंत्री पद पर थे और भारतीय जनता पार्टी का आकलन था कि यदि स्वामी जैसे अनुभवी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा तो वहां वह सत्ता में वापस लौटेगी । लेकिन उत्तराखंड को अच्छी तरह से न जानने की वजह से नित्यानंद स्वामी पहले मुख्यमंत्री के रूप में जनता को लुभा नहीं पाए और उन्हें भगत सिंह कोश्यारी के हाथों सिंहासन गंवानआना पड़ा। तब के चुनाव में उत्तरांचल में कोशियारी की होशियारी की सरकार को जनता ने बदल दिया।

उस चुनाव में कांग्रेस ने अच्छा खासा बहुमत प्राप्त किया था बहुमत के पीछे यदि किसी व्यक्ति की सबसे अधिक मेहनत थी और जिसे इसका उसे श्रेय दिया जाना चाहिए था वह थे हरीश रावत। लेकिन गांधी परिवार के निकट होने तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं कई बार केंद्र में मंत्री पद पर रहने के अनुभव के चलते नारायण दत्त तिवारी ऐसे मुख्यमंत्री बने जो भारत के दो प्रदेशों के मुख्यमंत्री रहे पहले उत्तर प्रदेश और उसके विभाजन के बाद तत्कालीन उत्तरांचल में उन्होंने जनप्रतिनिधि के सर्वोच्च पद को प्राप्त किया लेकिन हरीश रावत इसे पचा नहीं पाए और हाईकमान से केंद्र में मंत्री पद का प्रसाद प्रसाद पाने के बावजूद वे लगातार नारायण दत्त तिवारी को अस्थिर करने में लगे रहे।

नारायण दत्त तिवारी अपने समय के बेहद चतुर राजनीतिक खिलाड़ी यूं ही नहीं माने जाते थे उन्होंने हर बाधा और हरीश रावत एंड कंपनी की हर चाल के बावजूद पांच साल का कार्यकाल पूर्ण किया। हालांकि हरीश रावत को मुख्यमंत्री पद न मिलने की एवज में केंद्र सरकार में पहले राज्य मंत्री एवं बाद में दबाव की राजनीति को सफलतापूर्वक संचालित करने पर कैबिनेट मंत्री का पद मिला लेकिन मंत्री होते हुए भी उन्होंने तिवारी सरकार को चैन से नहीं बैठने दिया।

उक्त प्रकरण की चर्चा का उद्देश्य केवल यह है कि कांग्रेस में यह उठापटक इतनी बढी कि उत्तरांचल (तब तक उत्तराखंड का नाम नहीं मिला था) से उसकी विदाई हुई और भारतीय जनता पार्टी सत्ता में लौटी तथा कोशियारी नए मुख्यमंत्री बनकर सत्ता में आए और बीच में ही उन्हें हटाकर भुवन चंद्र खंडूरी को मुख्यमंत्री पद दिया गया मगर उनकी कठोर शासन शैली के चलते पार्टी में ही असंतोष इतना बढ़ा कि रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बनाया गया । पर, चुनाव आते आते एक बार फिर से खंडूरी मुख्यमंत्री बना दिए गए । एक बार फिर से भाजपा को पूरा विश्वास था कि एक सफल प्रशासक होने के नाते भुवन चंद्र खंडूरी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में लौटेगी लेकिन सत्ता की अलग पलट में माहिर पहाड़ी मतदाता ने खंडूरी एवं भाजपा दोनों को आईना दिखा दिया ।

इस बार भी हरीश रावत मुख्यमंत्री बनते – बनते रह गए दिग्गज राजनीतिज्ञ माने जाने वाले स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया गया लेकिन अंततः महज दो ढाई साल बाद ही हरीश रावत की लॉटरी खुली और उन्होंने एक परिपक्व नेता की तरह सरकार का नेतृत्व किया और वह अगले चुनाव तक मुख्यमंत्री रहे।

लेकिन ‘हरदा’ के नेतृत्व में कांग्रेस के हिस्से में बुरी हार आई और एक बार फिर भाजपा सत्ता में आई रमेश पोखरियाल निशंक ने आर एस एस की पृष्ठभूमि एवं अपने वार्क्चातुर्य से हाईकमान को प्रभावित कर मुख्यमंत्री का पद प्राप्त किया उनके कार्यकाल में कुंभ का आयोजन हुआ जो सफल रहा लेकिन उनकी सरकार पर कुंभ में भारी घपले बाजी के आरोप भी विपक्ष की तरफ से लगे जिनके चलते हुए भाजपा को घाटा उठाना पड़ा।

2017 के चुनावों में भाजपा जब विजय हुई तब राजनीतिक क्षेत्रों में उम्मीद थी कि सम्भवतः खंडूरी, कोशियारी या निशंक में से किसी एक को मुख्यमंत्री की बागडोर सौंपी जाएगी । हालांकि सतपाल महाराज इस बार पाला बदलकर भाजपा में आ गए थे ।‌उत्तराखंड में उनका कद बहुत बड़ा था लेकिन भाजपा में सीनियर नहीं थे अतः उनके दावे को भाजपा को जानने वाले कमजोर ही समझ रहे थे । लॉटरी खुली तो आश्चर्यजनक रूप से त्रिवेंद्र सिंह रावत के नाम । त्रिवेंद्र सिंह रावत स्वच्छ छवि के शांत एवं सौम्य नेता माने जाते थे लेकिन प्रशासनिक क्षमता के रूप में वे विशेष छाप नहीं छोड़ पाए और अंततः 2022 के चुनावों को सामने देख भाजपा को लगा कि उनके नेतृत्व में पार्टी की नैया पार नहीं होने वाली है तो जुझारू माने जाने वाले उत्तराखंड के सांसद तीरथ सिंह रावत को उत्तराखंड का दसवां मुख्यमंत्री बनाया।

10 मार्च 2021 में कोरोना की बड़ी चुनौती के बीच उन्होंने कार्यभार संभाला लेकिन अपनी वाणी पर संयम न रख पाने की कमजोरी के चलते वें शुरू से ही विवादों में रहे। कभी फटी जींस तो कभी कुछ और मुद्दों को लेकर में विवादों का केंद्र बने रहे। भाजपा हाईकमान ने उन्हें अपने तरीके से समझाया भी, संकेत भी दिए मगर तीरथ सिंह रावत खुद को बदल नहीं पाए तो नड्डा एंड कंपनी को साफ दिखने लगा कि उत्तरी भारत के इस छोटे से राज्य में अगर भाजपा सत्ता में वापस नहीं आई तो बड़ी किरकिरी होगी क्योंकि पश्चिमी बंगाल में पहले ही भारी फजीहत हो चुकी थी।

संवैधानिक संकट की आड़ लेते हुए तीरथ सिंह रावत को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया और पुष्कर सिंह धामी के रूप एक युवा चेहरा मुख्यमंत्री के रूप में उत्तराखंड को मिला। अब धामी कितने सफल मुख्यमंत्री साबित होंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

अब कितना ही कहा जाए कि कोरोना के चलते उपचुनाव में हो पाने की वजह से तीरथ सिंह रावत 6 महीने से पहले मुख्यमंत्री पद पर रहने हेतु विधायक बनना संभव नहीं था दूसरे संविधान की धारा 15a के अनुसार अब विधानसभा के कार्यकाल में 1 वर्ष से भी कम का समय रह गया है इसलिए उनके लिए यदि कोई विधायक सीट भी छोड़ता है तो भी हरक सिंह रावत मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उसकी सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते थे यूं तो इस बीच कांग्रेस की इंदिरा हृदयेश के निधन से सिल्ट की सीट भी खाली हुई और उससे तीरथ चुनाव लड़ सकते थे लेकिन उस सीट पर मुख्यमंत्री को लड़ाना शायद भाजपा को जंचा नहीं।‌

उम्मीद करनी चाहिए कि अब 2022 के चुनावों से पहले उत्तराखंड में कोई नया मुख्यमंत्री नहीं आएगा हालांकि राजनीति में कुछ भी संभव है और धामी अपनी युवा छवि से भाजपा के पक्ष में हवा का रुख मोड़ने की पूरी कोशिश करेंगे लेकिन साथ ही साथ उन्हें मतदाताओं के सत्ता विरोधी रुख का का सामना भी करना पड़ेगा।

अस्तु, राजनीति की चौसर पर दांव-पेच का खेल शुरू हो चुका है उत्तराखंड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश एवं पंजाब भी चुनाव में होंगे देखते हैं कोरोना की मार से त्रस्त जनता को भाजपा कैसे लुभा पाती है या कांग्रेस और विपक्षी दल कैसे जनता के आक्रोश को भुना पाते हैं। ‌

– डॉ घनश्याम बादल
MOB : 9412903681

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