आलेख : कब बनेगा शहीदों के सपनों का भारत?

टीम डिजिटल : यकीन मानिए आज इतने वर्षों के बाद भी हम अपने शहीदों के सपनों का भारत नहीं बना पाए।ख्याल कीजिए किसी राम मोहम्मद सिंह आजाद का, जिसका बचपन में नाम शेर सिंह रहा हो और बाद में जो वास्तव में ही शेर से बढ़कर काम कर गया हो, शहीद ऊधम सिंह के नाम से आज जिन्हें जाना जाता है। एक बार भी सोचिए कि आखिर शेर सिंह नाम के बदले राम मोहम्मद सिंह आजाद क्यों रखा? इसके पीछे क्या कारण और सोच रही होगी। उनकी सोच थी,सर्व धर्म समभाव की लेकिन दुर्भाग्य कि हम आज भी बिल्कुल उस सोच के विपरीत हैं।13 अप्रैल,1919 को हुए जलियांवाला बाग नरसंहार का नाम सुनकर किसका बदन सिहर नहीं उठता? ऐसा कोई हिंदुस्तानी नहीं,जो अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर नहीं उठता होगा। पर उधम सिंह जैसे देश के वीर सपूत ने अंग्रेजों की इस कायरता का वीरता से जवाब दिया। देश में भगत सिंह, आजाद, बिस्मिल, बिसरा मुंडा, करतार सिंह सराभा, दुर्गा भाभी क्रांतिकारियों की पूरी टीम ने अंग्रेज की सत्ता को जड़ से उखाड़ने में खुद को झोंक रही थी, तो वहीं अंग्रेजों की फांसी पर इंग्लैंड में झूल जाने वाले सरदार उधम सिंह ने इसका बदला अंग्रेजों की ही जमीन पर जाकर लिया। सरदार उधम सिंह ने जलियांवाला बाग नरसंहार के जिम्मेवार माइकल ओ डायर को उन्हीं की धरती पर गोलियों से भून डाला और बिल्कुल सरदार भगत सिंह और उसके साथियों अंदाज में आत्मसर्मपण कर दिया। खास बात तो ये थी कि उन्होंने जनरल डायर के अलावा किसी को निशाना नहीं बनाया, क्योंकि वहां पर महिलाएं और बच्चे भी थे। अंग्रेजों ने फांसी की सजा की सुनवाई के दौरान जब उधम सिंह से पूछा कि उन्होंने किसी और को गोली क्यों नहीं मारी, तो वीर उधम सिंह का जवाब था कि सच्चा भारतीय कभी भी महिलाओं और बच्चों पर हथियार नहीं उठाते। दुर्भाग्य कि आज हम पैदल चलते मजदूरों पर, न्याय मांगते किसानों पर,हकों के लिए आन्दोलनरत कर्मचारियों पर, शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ रहे छात्रों पर लाठियां चलाते हैं और वह भी अपने ही स्वाधीन देश में? पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में पैदा हुए थे शहीद ऊधम सिंह। बचपन में ही माता-पिता के असामयिक निधन हो जाने के कारण इन्हें अपने बड़े भाई के साथ अनाथालय में शरण लेनी पड़ी।यहीं से इन्होंने अपना नाम शेर सिंह से बदलकर ऊधम सिंह रखा। सरदार उधम सिंह ने भारतीय समाज की एकता के लिए अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था,जिससे इन्होंने यह सन्देश दिया कि भारत में रहने वाला हर कोई भारतीय है और इस देश की विशेषता ही यह है कि हम गांधी के सर्व धर्म समभाव वाले लोग हैं। अपने भाई की असामायिक मृत्यु के बाद तो उधम सिंह बिल्कुल ही अनाथ हो गए लेकिन देश को अनाथ नहीं होने दिया। उसके बाद इन्होंने अनाथालय आश्रम को छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधम सिंह अनाथ होने के बावजूद अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।जलियावाला नरसंहार के उधम सिंह प्रत्यक्षदर्शी थे। हजारों नामी-बेनामी भारतीयों की हत्या को उन्होंने अपनी आँखों से देखा था।उसी समय उन्होंने उस मिट्टी को हाथ में लेकर कसम खाई थी कि वे इसका बदला जनरल डायर को मारकर ही लेंगे। सरदार उधम सिंह क्रांतिकारियों से चंदा इकट्ठा कर देश से बाहर गए और उन्होंने कई देशों की यात्रा की।आखिरकार किसी तरह से उधम सिंह लन्दन पहुँच ही गए और 1940 में उन्होंने उन तमाम भारतीयो के खून का बदला खून से ही लिया। लन्दन में एक जगह जहां डायर जब एक मीटिंग को संबोधित कर रहे थे,तब उधम सिंह ने इस कार्य को अंजाम दिया,ज्ञात रहे कि उधम सिंह अपनी रिवाल्वर भी एक मोटी किताब में छिपाकर ले गए थे।उधम सिंह ने अपनी कसम पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर जवान कभी बख्शते नही हैं। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह डायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई महिलाएं भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। आखिरकार वहाँ उन पर केस चला और उन्हें फांसी की सजा दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया।उसके ठीक सात साल बाद भारत आजाद हो गया और लगभग तीस साल के बाद इनके अवशेष भी भारत देश को प्राप्त हुए।सरदार उधम सिंह की देश के प्रति समर्पण,त्याग और बलिदान से आज भी हमें प्रेरणा देती है और आज के युवाओं को इनसे प्रेरणा भी लेनी चाहिए।

कृष्ण कुमार निर्माण
करनाल, हरियाणा।
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