लेख : पर्वतीय क्षेत्र में चकबंदी कब तक?

टीम डिजिटल : उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी को लेकर समय-समय पर सरकारें योजनाएं तो बनाती रही हैं लेकिन उन योजनाओं को धरातल पर उतारने में हर सरकार हमेशा ही नाकाम रही हैं। इतने लंबे अरसे के बाद भी चकबंदी का न होना पूर्ववर्त्ती सरकारों की हीलाहवाली एवं खोखले दावों की पोल खोल रही है। सत्तर के दशक की शुरुआत में अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई थी जो कि देहरादून के एक गांव तक ही सिमट कर रह गयी। पृथक राज्य बनने के बाद सन् 2007 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने पहाड़ में स्वैच्छिक चकबंदी का नारा दिया था। जिसके तहत ग्रामीण अपनी सहमति से एक ही स्थान पर खेती करते हैं। जनपद उत्तरकाशी के बीफ व खरसाली गांव तक ही यह प्रयास थम कर रह गया। सन् 2009 में सरकार ने स्वैच्छिक चकबंदी के प्रति जागरूकता लाने के लिए हर जिले के एक गांव को चिन्हित करने की योजना बनायी थी। जिसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। 2015 के शुरुआती दौर में कांग्रेस सरकार ने भाजपा सरकार द्वारा बनाए गए चकबंदी कानून में फेरबदल करते हुए नया चकबंदी कानून बनाने का बीड़ा उठाया। जिसके लिए पर्वतीय चकबंदी सलाहकार समिति का गठन किया गया। जिसने चकबंदी विधेयक का प्रारूप तैयार कर तब सरकार को सौंपा था। उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला। चकबंदी का मुख्य उद्देश्य बिखरी कृषि भूमि को एक जगह करना है। ताकि हरेक को एक ही स्थान पर खेती करने में आसानी हो। पहाड़ी क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों, छिटकी-बिखरी जोत, सीढ़ीनुमा खेत, एक ही जमीन के कई हिस्सेदार होने जैसे कारणों से तरह-तरह के पेंच फंसते रहते हैं। दूसरे पहाड़ों में सन् 1960 से भू-बंदोबस्त लंबे समय तक न होने की प्रक्रिया भी चकबंदी में आड़े आती रही है। वर्तमान सरकार ने पौड़ी जिले के पांच गांवों में स्वैच्छिक चकबंदी की शुरुआत तो की लेकिन वह भी अपना रंग नहीं ला ना रही है। राज्य के मैदानी इलाकों में अनिवार्य चकबंदी और पहाड़ के लिए स्वैच्छिक या आंशिक चकबंदी है। कुछ समय पहले हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में उत्तराखंड जोत चकबंदी नियमावली को मंजूरी दी गई है। अब चकबंदी कितना आगे बढ़ेगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

– ओम प्रकाश उनियाल

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