आजादी का अमृत महोत्सव विशेष : पहचानने होंगे आजादी के अमृत, उत्सव और हलाहल!

डिजिटल डेस्क : आजादी की 75 वी वर्षगांठ पर पूरा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है । महामारी की चुनौतियों के बीच महोत्सव पर चिंतन देश के जीवट का परिचायक है । कुल मिलाकर कह सकते हैं कि आज देश ऐसी सुदृढ़ अवस्था में है कि किसी भी चुनौती के बावजूद हम अपनी खुशियों को लॉक डाउन नहीं करते उस पर कर्फ्यू नहीं लगाते यानी अब हमने काल और परिस्थितियों की आंखों में आंखें डाल कर हिम्मत के साथ कहना और दिखाना सीख लिया है कि इस बदलते हुए भारत को कोई भी आसानी से नहीं झुका सकता है अब चाहे वह कोई देश हो या परिस्थिति।

नीव की ईंटों को नमन :

यदि आज हम ऐसा कर पा रहे हैं तो यह कोई एक दिन में नहीं हो गया है इसके पीछे 1947 के बाद का पूरा कालखंड तो श्रेय देने लायक है ही आज़ादी से पहले के उन जुझारू स्वाधीनता सेनानियों को भी इसका श्रेय देना होगा जिन्होंने अंग्रेजों के अत्याचार सहे, अपने परिवार को एक तरफ रख कर देश के लिए बलिदान किए और आने वाली पीढ़ियों में देश के लिए कुछ करने का जज़्बा भरा । तो आजादी के इस अमृत महोत्सव पर सबसे पहला सलाम और नमन जाता है उन नींव की ईंटों को जिनके खून – पसीने पर आज देश की बुलंद इमारत मजबूती के साथ खड़ी हुई है।

श्रेय की होड़ में राजनीति

हो सकता है राजनीति को इस पर ऐतराज़ हो । यह बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि राजनीति का चरित्र ही ऐसा होता है वह किए हुए और न किए हुए का भी श्रेय लेने की होड़ में सदा आगे रहती है । आज़ाद भारत की संप्रभुता, अखंडता, सुदृढ़ता, एकता एवं आर्थिक तथा रक्षा क्षेत्र की मजबूती, कृषि में बंपर पैदावार का श्रेय लेने की होड़ अगर राजनीति में होती है तो यह कोई अचंभित करने वाली बात नहीं है, न ही इस बात पर हतप्रभ होना चाहिए कि राजनीति का एक वर्ग विशेष सारी कमियों के लिए दूसरे राजनीतिक दलों या विचारधाराओं को दोषी ठहराते रहा है । यह पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा और इसी आरोह अवरोह और झंझावात के बीच देश बढ़ता रहा है और बढ़ता रहेगा।

सब ने मिलकर बनाया है भारत

यह लिखने का मतलब यह कतई नहीं है की आज़ादी के बाद की सभी सरकारों ने एक ही मन: स्थिति और रणनीति के साथ देश का विकास किया है . न ही यह कहना चाहिए कि एक विचारधारा विशेष की सरकारों ने ही देश को आकाश पर पहुंचाया या पाताल के गर्त में धकेल दिया और न ही इसका श्रेय केवल राजनेताओं या दलों को दिया जाना चाहिए। यदि देश ने आज तरक्की की है तो इसका ठोस आधार है यहां के देशभक्त नागरिक। रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाले सैनिक, खेतों में पसीना बहाने वाले कृषक और मजदूर, अर्थव्यवस्था को रीढ़ की हड्डी की तरह मजबूत करने वाले व्यापारी, इस सारी उन्नति एवं प्रगति के सहभागी हैं । दलित, दलित,मजदूर, शोषित, सर्वहारा वर्ग, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और दूसरे धर्म भी सबने किसी न किसी तरह से इस देश की बगिया को सींचा है तभी यह भारत की हरी-भरी बगिया एक बड़े उद्यान में परिवर्तित हो पाई है । हां, माली के रूप में सरकारों को भी इसका श्रेय दिया जा सकता है।

कौन हड़प गया सारा अमृत ?

जब-जब भी समस्याओं के बीच समुद्र मंथन हुआ है तब -तब किसी को अमृत तो किसी को हलाहल मिला है । आजाद भारत के अमृत मंथन में भी देव और दैत्यों के रूप में देश के हर वर्ग ने वासुकी रूपी एकता की मजबूत सर्प रज्जु से अपने जीवट के विंध्याचल पर्वत से मथा है और इसमें से 14 नहीं असंख्य रत्न निकले हैं । अमृत भी निकला है मगर जैसा समुद्र मंथन के समय हुआ था वैसा ही आजादी के अमृत मंथन में भी हुआ है । भोले देव के रूप में देश के एक बड़े सर्वहारा वर्ग के हिस्से में हलाहल ही आया है ।

हलाहल पीता सर्वहारा

गरीबी, भूख,अशिक्षा,मजबूरी, बेरोजगारी और यहां तक कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी न हो पाने जैसे हलाहल यदि किसी के हिस्से में आए हैं तो वह सर्वहारा वर्ग ही है । जबकि अमृत निकलते ही समर्थ वर्ग ने उसे हथियाने के लिए हर तरह की मोहिनियों का इस्तेमाल किया है । भोले -भाले वर्ग को बहलाया, फुसलाया, डराया, धमकाया या मारा पीटा तक गया और कभी चालाकी से तो कभी ताकत से अमृत कलश अपने और अपने लोगों के लिए हथिया लिया । यह आजादी के अमृत महोत्सव के अमृत मंथन का सबसे कटु सत्य भी है और अनुभव भी।

चालाक स्वार्थी तत्व

बेशक, विस्फोटक अंदाज में बढ़ती हुई जनसंख्या ने प्रगति की राह में रोड़े ही नहीं अटकाए अपितु बड़ी – बड़ी दीवारें भी खड़ी की और इन दीवारों पर स्वार्थी और लोलुप तत्वों ने जाति, धर्म,मजहब, ऊंच-नीच, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद का ऐसा रंग पोता कि आम आदमी को असलियत नजर ही नहीं आ पाई और जब कुछ निष्पक्ष बुद्धिजीवियों ने यह रंग -रोगन उतारकर इन दीवारों का असली रंग दिखाने की कोशिश की तो उनके मुंह कभी लालच देकर, कभी पुरस्कारों से कभी दमन से तो कभी चालाकी से बंद कर दिए गए यानी सत्ता पर काबिज वर्ग ने इस बात का पूरा इंतजाम करके रखा कि उसकी असलियत कभी सामने न आए । मगर, यह पब्लिक है, यह सब जान जाती और देश के बुद्धू समझे जाने वाले आम आदमी ने समय-समय पर सयाने बनने वाले राजनीतिक दलों को आईना भी दिखाया है ।

सुधरे मीडिया भी

यदि इस देश का आम आदमी बुद्धू होता तो फिर यहां सरकारों की अदला बदली भी नहीं की होती । मीडिया का चालाकी भरा उपयोग तो 1971 के युद्ध के बाद ही शुरू हुआ जब इंदिरा लाओ देश बचाओ जैसे नारे के साथ देशभक्ति के भावों को भुनाया गया और उसकी नवीनतम परिणीति पाकिस्तान पर हुए सर्जिकल एयर स्ट्राइक के रूप में भी सामने आई । यदि आज मीडिया पर ‘गोदी’ मीडिया होने का आरोप लग रहा है तो शायद एकदम गलत भी नहीं है मीडिया का भी एक खास वर्ग हमेशा से ऐसे ही दृष्टिकोण वाला रहा है जो एक खास वर्ग को खास अंदाज में उभारता है और दूसरे का स्याह पक्ष चुन-चुन कर सामने लाता है मगर मीडिया भी शायद गलतफहमी में है क्योंकि यदि मीडिया ही सरकारें बदलने का औजार होता तो फिर इस बार बंगाल में ममता की वापसी नहीं होती। एग्जिट पोल के सर्वेक्षण समय-समय पर धराशाई नहीं होते । लेकिन इस प्रवृत्ति को हम अमृत तो नहीं कह सकते ! यह हलाहल ही है ऐसा धीमा जहर जो बड़ी चालाकी से मन मस्तिष्क में भरकर अपना लक्ष्य साधा जाता है । अब आम आदमी को इस नए हलाहल से भी बचने का रास्ता ढूंढना होगा।

न करें अमृत कलश का अपमान

ढूंढने पर आएं तो हजारों अमृत और लाखों हलाहल ढूंढे जा सकते हैं स्वाधीनता के बाद के भारत मंथन में । लेकिन ऐसा करना अमृत महोत्सव की उत्सव धर्मिता का अपमान होगा। उत्सव का अवसर है तो उत्सव मनाना भी चाहिए मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कहीं उत्सवों की झोंक में कोई हमें हलाहल न पिला जाए । अभी-अभी ओलंपिक खेल खत्म हुए हैं और इन खेलों में भारत ने पिछले सारे ओलंपिक खेलों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है नीरज का स्वर्ण चानू व रवि दहिया का रजत या दूसरों के साथ हॉकी टीम का कांस्य उत्सव का कारण होना ही चाहिए । राजनैतिक स्यापा करने वालों को भी सोचना चाहिए कि जब वें संसद भी नहीं चलने देते हैं तब उनकी नैतिकता कहां जाती है ? मान लेते हैं कि सरकार ने बहुत चालाकी से अपने पासे फेंके मगर जब संसद का पूरा सत्र ही बिना चर्चा समाप्त हो जाए तब देश का जो पैसा और समय उस पर ज़ाया हुआ उसका जिम्मेदार कौन है ?

बहुत जरूरी है चिंतन

बेहतर होता आप संसद में डट कर खड़े होते, सरकार का विरोध करते ,अपनी बात को जायज तरीके से इस तरह उठाते कि जनता आपके साथ खड़ी होती लेकिन क्योंकि विपक्ष में रहकर आप विरोध के अलावा कुछ सकारात्मक करना ही नहीं चाहते हैं तब जनता कैसे आपको पुनः सिंहासन सौंपे ? यह आपको सोचना होगा। सोचना सरकार को भी पड़ेगा कि इस देश में किसी को भी कैसे भी देश चलाने का लाइसेंस जनता ने कभी नहीं दिया है आम सहमति के साथ देश चलेगा तो विकास की गति भी तेज होगी इसलिए इस अमृत महोत्सव में से मंथन करके हमें सद्भाव एवं आपसी सहमति का ऐसा अमृत निकालना होगा जो देश को हमेशा उत्सव मनाने का अवसर दें अन्यथा आजादी काम आएगी ना अमृत और न ही महोत्सव कुछ भला कर पाएंगे ।

– डॉ० घनश्याम बादल
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Leave A Reply

Your email address will not be published.